राजस्थान भूगोल

राजस्थान भूगोल

Geetanjali Academy- By Jagdish Takhar

 

राजस्थान मेें राष्ट्रीय उद्यान

1. रणथम्भोर राष्ट्रीय उद्यानः-

  • राजस्थान का प्रथम राष्ट्रीय उद्यान।
  • सवाई माधोपुर जिले में 282.03 वर्ग कि.मी. में विस्तृत।
  • 1 नवम्बर, 1980 में राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया।
  • विभिन्न प्रकार के सर्वाधिक जीव पाए जाते है।
  • त्रिनेत्र गणेश जी एवं जोगी महल प्रमुख विशेषता है।

1955 से 1979 तक यह अभ्यारण्य था। 1974 में ‘‘प्रोजेक्ट टाईगर‘‘ से जुड़ा।

 

2. केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान:- 

  • भरतपुर जिले में स्थित।
  • क्षेत्रफल 28.73 वर्ग कि.मी.
  • 1956 में अभ्यारण्य।
  • 27 जुलाई, 1981 में राष्ट्रीय उद्यान घोषित।
  • 1985 में विश्व विरासत सूची में शामिल।
  • साईबेरियन सारस, अजगर के कारण प्रसिद्ध।

 

3.  मुकुन्दरा हिल्स राष्ट्रीय उद्यान:- 

  • कोटा एवं चित्तौडगढ़ जिलों में विस्तृत।
  • कुल क्षेत्रफल 199.55 वर्ग कि.मी.।
  • 9 जनवरी, 2012 को राष्ट्रीय उद्यान घोषित।
  • इसमें तीन अभ्यारण्य के क्षेत्र आते है।

         दर्रा 152.32 वर्ग कि.मी.

        जवाहर सागर 37.98 वर्ग कि.मी.

        चम्बल 5.25 वर्ग कि.मी.

  • गागरोणी तोते एवं बाघ के लिए प्रसिद्ध

 

आखेट निषिद्ध क्षेत्र:-  33

कुल 26719.94 वर्ग कि.मी. में विस्तृत

सबसे बड़ा: संवतसर-कोटसर (चुरू)

सबसे छोटा: संथाल सागर (जयपुर/दौसा सीमा)

33 आखेट निषिद्ध क्षेत्र 17 जिलों में विस्तृत है।

 

जोधपुर – 7 अलवर – 2 टोंक – 1
बीकानेर – 5 जयपुर – 2 जालौार – 1
अजमेर – 3 बाड़मेर – 1 सवाई माधोपुर – 1
चुरू – 1 बूँदी – 1 नागौर – 2
उदयपुर – 1 पाली – 1 चित्तौड गढ़ – 1
जैसलमेर – 2 बांरा – 1

 

मृगवन:-

 

1 चित्तौडगढ़ मृगवन – चित्तौड

2 माचिया सफारी – जोधपुर

3 पुष्कर मृगवन – अजमेर

4 अमृता देवी – खेजड़ली, जोधपुर

5 सज्जन गढ़ – उदयपुर

6 संजय उद्यान – शाहपुरा, जयपुर

7 अशोक विहार – जयपुर

 

जंतुआलय :- कुल 5 है।

1 जयपुर – 1876 में स्थापित, सबसे बड़ा एवं पुराना।

2 उदयपुर

3 कोटा

4 बीकानेर

5 जोधपुर

 

अभ्यारण्य:-

  अभ्यारण्य प्रमुख जीव
1 राष्ट्रीय मरू गोड़ावण
2 सरिस्का बाघ, हरे कबूतर, मोर
3 केसर बाग जरख, लोमड़ी
4 वन विहार जरख, बघेरा
5 राम सागर गीदड़, भेडिया
6 बांध बारेठा पक्षी, बाघ
7 ताल छापर काले मृग, कुरंजा
8 रामगढ़ विषधारी बाघ
9 कुम्भल गढ़ भेडिया, भालु
10 सीतामाता उड़न गिलहरी
11 सज्जन गढ़ हिरण
12 माउण्ट आबू जंगली मुर्गा, भालु
13 भैंसरोड़ गढ़ घड़ियाल
14 फुलवारी की नाल
15 जवाहर सागर मगर, घडियाल
16 शेर गढ़ साँप
17 कैलादेवी जरख, बघेरा
18 दर्रा गगरोनी तोते
19 सवाई मानसिंह बाघ
20 नाहर गढ़ जैविक पार्क, बघेरा, साही
21 जमवा रामगढ़ चिड़िया
22 जयसमंद लकड़बग्घा, सियार
23 टाड़गढ़ रावली रीछ, जरख
24 बस्सी जरख
25 राष्ट्रीय चम्बल घडियाल, डाल्फिन

 

राजस्थान की औद्योगिक नीति

  1. जनता सरकार की औद्योगिक नीति, जून 1978 ई.
  2. शेखावत सरकार की औद्योगिक नीति, 1990
  3. औद्योगिक नीति, 1994
  4. औद्योगिक नीति, जून 1998 → आधारभूत ढाँचे का विकास
  5. निवेश नीति → 28 जूलाई, 2003
  6. नए निवेश पर या स्थापित इकाइयों द्वारा आधुनिकीकरण विस्तार हेतु निवेश पर लक्जरी टेक्स पर 100ः, स्टाम्प ड्यूटी पर 50ः छूट का प्रावधान है।
  7. नई औद्योगिक नीति: फरवरी, 2005
  8. औद्योगिक व निवेश प्रोत्साहन नीति, जून 2010।

 

राजस्थान में भारत सरकार के औद्योगिक उपक्रम

      1. हिन्दुस्तान कॉपर लि. (भ्ब्स्):- 1967, मुख्यालय – कोलकाता।

      प्रमुख परियोजनाएँ:-

  • खेतड़ी कॉपर कॉम्पलेक्स।
  • खो दरीबा ताम्र परियोजना।
  • चांदमारी ताम्र परियोजना।

     2. हिन्दुस्तान जिंक लि. (भर््स्):- 1966, प्रधान कार्यालय – उदयपुर।

  • जिंक स्मेलटर, देबारी
  • जिंक स्मेलटर, चन्देरिया (चित्तौड गढ़)

      3. हिन्दुस्तान मशीन टूल्स (भ्डज्):- 1964, चेकोस्लोवाकिया के सहयोग से स्थापित किया गया अजमेर में।

        इन्स्टूªमेन्ट लिमिटेड:- 1964 में कोटा में स्थापना।

  • इसकी सहायक राजस्थान इलेक्ट्रोनिक्स एण्ड इन्स्टूªमेन्ट लिमिटेड, कनकपुरा (जयपुर) में स्थापित किया गया।

      4. सांभर साल्ट्स लि.:- 1964, सांभर (जयपुर) में।

  • केन्द्र व राज्य का अंश 60: 40 है।
  • इस झील से सोडियम क्लोराइड, सोडियम सल्फेट, सोडियम बाई कार्बोनेट का उत्पादन किया जाता है।

      5. राजस्थान ड्रग्स एण्ड फार्मास्यूटिकल्स लि.:- 1978 में जयपुर।

      6. मॉडर्न बंेकरीज इण्डिया लिमिटेड:- 1965, जयपुर।

  • वर्तमान में इसे हिन्दुस्तान लिवर लिमिटेड को बेच दिया गया।

 

राज्य सरकार के औद्योगिक उपक्रम

  1. राजस्थान स्टेट केमिकल वर्क्स, डीडवाना (नागौर)
  2. दी गंगानगर शुगर मिल्स लि., श्री गंगानगर
  3. स्टेट वूलन मिल्स, बीकानेर (1960)
  4. राजस्थान स्टेट टेनरीज लि. (टोंक), (1971) – (भेड़ की खाल का चमड़ा)
  5. वस्टेड स्पिनिंग मिल, चुरू (लाडनू) → RAJSICO संचालित करती है।
  6. प्लोर्सपार बेनिफिशयल संयंत्र → माण्डों की पाल (डूंगरपुर)
  7. CIMCO → Central India machinery manufacturing company

→ भरतपुर (1957)

→ रैल वेगन बनाए जाते है।

 

राज्य के प्रमुख औद्योगिक निगम / संस्थाए

1. RIICO [Rajasthan State Industrial development and investment corporation Ltd.]

  • स्थापना: 28 मार्च, 1969

1979 में इससे RSMDC को अलग कर दिया गया।

  • प्रमुख कार्य:- 

(1) EPIP की स्थापना → 

          प्रथम – सीतापुरा

     दूसरा – बोरनाडा

     तीसरा – नीमराणा

 

(2) एपैरल पार्क:- RIICO द्वारा बगरू-छितरौली में विकसित किया जा रहा है।

 

(3) एग्रो फूड़ पार्क (झालावाड़):- निजी क्षेत्र के सहयोग से भ्वजपबनसजनतम भ्नइ

    प्रथम – शनपुर (कोटा)

    दूसरा – बोरनाड़ा (जोधपुर)

    तीसरा – उद्योग विहार (गंगानगर)

    चतुर्थ – अलवर

 

(4) इंट्रिग्रेटेड टेक्सटाईल पार्क:-   

किशनगढ़ (अजमेर)

सेनियाणा (चित्तोड गढ़)

बलोतरा (बाड़मेर)

मण्डा-भिण्डा (कालाडेरा), जयपुर

 

(5) सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी पार्क:- 

    कनकपुरा (जयपुर)

 

(6) दस्तकारी औद्योगिक पार्क:- 

    पाल शिल्पग्राम (जोधपुर)

    जैसलमेर

 

(7) बायोटेक्नोलॉजी पार्क:- 

   सीतापुरा चोपन्की (भिवाडी)

 

(8) इन्फ्रास्ट्रकचर पार्क:- 

   नीमराना (अलवर)

 

(9) सायबर पार्क:- जोधपुर

 

(10) स्पाईस पार्क (मसाला):- पहला कोटा

 

(10) जापानीज पार्क:- नीमराना (अलवर)

    छपेेपदए डपजेनपए क्ंपापदए डपजेनइपेीप 

     – क्ंपदपबीप ब्वउचंदपमे के कार्यालय।

     37 कम्पनियों के वाणिज्य कार्यालय।

 

(11) खुशखेडा (भिवाडी) – होण्डा सिटी 

    कार प्रोजेक्ट

 

(12) टपूकरा/टपूकड़ा – होण्डा मोटर 

     साईकल प्लान्ट।

 

2. RFC – Rajasthan Finance Corporation

  • एक वैधानिक निगम है।
  • स्थापना अप्रैल, 1955, मुख्यालय – जयपुर।
  • मुख्य उद्देश्य – लघु एवं मध्यम उद्योगों को दीर्घकालीन वित्तीय सहायता प्रदान करना।

प्रमुख योजना:-

(1) शिल्पबाडी योजना (1987-88)

(2) सेमफेक्स (SemFex)

(3) एकल खिडकी योजना (लघु एवं SSI Unit को 2 करोड़ धनराशि उपलब्ध कराना।)

(4) गुड बोरोवर्स लोन स्कीम

(5) गोल्ड कार्ड स्कीम

(6) प्लेटीनम कार्ड स्कीम

(7) सोरल स्कीम

 

3. RAJSICO – Rajasthan Small Industrial Corporation. 

  • स्थापना 1956 के कम्पनी एक्ट के अंतर्गत,  जून 1961 को।
  • मुख्यालय – जयपुर।

प्रमुख कार्य:-

(1) लघु उद्योगों को कच्चा माल, साख, तकनीक व प्रबन्धकीय सहायता उपलब्ध कराना।

(2) ‘राजस्थली‘ की नोडल एजेंसी है।

(3) सांगानेर में ‘एयर कारगो‘ का संचालन

(4) टोंक की मयूर छाप बीड़ी का संचालन

 

राज्य में औद्योगिक विकास के साथ जुड़े संस्थान

      I. उद्योग निदेशालय राजस्थान राज्य उद्योग विभाग (1949):- यह जिला उद्योग केन्द्रों के लिए वार्षिक योजना बनाता है।

      II. जिला उद्योग केन्द्र (1978):- वर्तमान में 36 कार्यरत है।

      III. राजस्थान कन्सल्टेन्सी ऑर्गोनाइजेशन लि. (RAJCON):- 

  • स्थापना 1978
  • छोटे व मध्यम परियोजना प्रवर्तकों को समग्र रूप से तकनीकी, विपणन, प्रबन्धकीय, विकासात्मक व वित्तिय परामर्श प्रदान करना।

 

      IV. उद्योग सम्वर्धन ब्यूरो (ठप्च्):- यह चीफ सेक्रेटरी के अधीन 10 करोड़ रू. तक के निवेश देखती है।

  • स्थापना 1991
  • बड़े उद्योगों को निवेश संबंधी जानकारी देना।
  • 2011 में Rajasthan enterprises single window enabling and clearance Act पास किया गया। इसमें समयबद्ध अनुमति पत्र प्रदान किया जाता है।

 

      V. लघु उद्योग सेवा संस्थान (SISI)

  • स्थापना 1958
  • आवश्यक प्रशिक्षण प्रदान करना

 

      VI. ग्रामीण गैर कृषि विकास अभिकरण ( RUDA : Rural Non-FARM Development Agency)

    • स्थापना: 1995

 

  • उद्देश्य:-

 

   (1) ग्रामीण दस्तकारों के जीवन स्तर में सुधार लाना।

   (2) उन्हें बाजार, आधुनिक तकनीक उपलब्ध कराना।

   (3) हथकरघा विकास हेतु कार्य करना।

 

 

VII. राजस्थान खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड:-

 

स्थापना: 1 अप्रैल, 1955

कार्य:-

    (1) खादी एवं ग्रामोद्योग के विकास की योजना बनाना।

    (2) निम्न आय वर्ग के लोगों को कारीगरों को खादी-ग्रामोद्योग के    

       माध्यम से रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना।

    (3) कच्चे माल की व्यवस्था तथा तैयार माल का विपणन करना।

    (4) सहकारी भावना को विकसित करना।

 

 

VIII.  हेंडीक्राफ्ट बोर्ड: स्थापना 1991

 

IX. राजस्थान राज्य व्यवस्था विकास निगम:-

 

 

  • स्थापना: 1984
  • असहकारी या वैयक्तिक क्षेत्र में हथकरघा उद्योग को बढ़ावा देना।

 

तेल क्षेत्र

  • राजस्थान में तेल उत्पादन 29 अगस्त, 2009 से शुरू हुआ।
  • ऑयल इण्डिया द्वारा Venezuelon company से
  •  बीकानेर में CBM निकालने का कार्य (OIDB : Oil Industry Developmet Board) द्वारा किया जा रहा है।

 

राजस्थान खनिज संस्थान

मंत्रालय स्तर (खान विभागक्ष्राजकुमार रिवणाद्व):- यह निम्न लिखित संगठनों के माध्यम से खनिज एवं खान को नियंत्रित, निर्देशित एवं समन्वित करता है।

 

1. राजस्थान राज्य खनिज विकास निगम लि.(RSMDC) 

 

  • स्थापना: 1979
  • मुख्यालय: उदयपुर
  • यह खनिज संपदा के दोहन एवं विपणन कार्य को त्वरित गति प्रदान करने एवं वैज्ञानिक रीति से विकसित करने का कार्य करता है।
  • मुख्यता जिप्सम उत्पादन में संलग्न।

 

 

2. राजस्थान राज्य टंगस्टन विकास निगम लि. स्थापना: 1983

 

    RSMDC की सहायक कंपनी है। वर्तमान में इसकी दो परियोजनाएँ है।

    (1) खेतगाँव (डेगाना – नागौर)

    (2) वाल्दा (सिरोही)

   3. राजस्थान राज्य खान एवं खनिज निगम लि. (RSMML) RSMDC से पृथक होकर निर्मित हुई है।

  • मुख्यालय: उदयपुर
  • स्थापना: 1974
  • यह झामरकोटडा (उदयपुर) क्षेत्र में रॉक फॉस्फेट का खनन करती है।
  • 2003 में RSMDL को RSMMLमें विलय किया गया।
  • राजस्थान में 79 प्रकार के खनिज पाए जाते है।
  • 1950-51 में खनिज उत्पादन मूल्य  रू. 3.45 करोड़ था।
  • वर्ष 2014-15 में खनिज उत्पादन मूल्य का लक्ष्य 3860 करोड़ रू. रखा गया।
  • खनन क्षेत्र से प्राप्त आय की दृष्टि से राजस्थान देश में 5वां स्थान रखता है।
  • अधात्विक खनिज उत्पादन में राजस्थान का देश में प्रथम स्थान है।

 

भारत में राजस्थान के खनिजों की स्थिति 

राजस्थान का एकाधिकार

  1. सीसा-जस्ता
  2. चाँदी
  3. संगमरमर
  4. तामडा
  5. पन्ना
  6. रॉक-फॉस्फेट
  7. कैडमियम

 

राजस्थान का महत्वपूर्ण स्थान

  1. जिप्सम
  2. एस्बेस्टेस
  3. सिलिका
  4. टंगस्टन
  5. ताँबा
  6. इमारती पत्थर

 

रास्थान में कम

  1. लौहा
  2. मैंगनीज
  3. कोयला
  4. पेट्रोलियम
  5. ग्रेफाईट
  6. बेन्टेनाईट
  7. स्लेटी पत्थर

 

 पूर्ण एकाधिकार

  1. वोलस्टोनाईट 
  2. जास्पर

 

खनिज वर्गीकरण

धात्विक खनिज: ऐसे खनिज जिनसे रासायनिक प्रक्रिया द्वारा मूल खनिज अलग किया जाता है।

 

  • लौह

 

(1) लोहा

(2) मेंगनीज

 

 

  • अलौह

 

(1) सीसा-जस्ता

(2) चाँदी

(3) बेरेलियम

(4) ताँबा

(5) केडमियम

 

अधात्विक खनिज: ऐसे खनिज जिनसे रासायनिक प्रक्रिया द्वारा मूल खनिज को अलग नहीं किया जाता है।

(1) उष्मारोधी: एस्बेस्टेस,  काँच बालुका, फेल्सपार, क्वार्टज, मेग्नेसाइट, वास्थेनाइट, चीनी मृतिका डोलो माइट।

(2) आणविक खनिज: अभ्रक, यूरेनियम

(3) बहुमूल्य खनिज: पन्ना, तामडा

(4) रासायनिक खनिज: नमक, बेराइटस, फ्लोराइट

(5) उर्वरक खनिज: जिप्सम, रॉक फॉस्फट, पाईराईट

         

धात्विक खनिज

1 लौह अयस्क
मेरीजा बानोल चौमू, सामोद
नीमला राइसेला जयपुर, दौसा
डाबला सिंथाना झुझुंनू
नाथरा पाल उदयपुर
थूर हण्डेर उदयपुर
2 मैंगनीज
तलवाडा, लीलवानी बांसवाडा
नेगडिया, स्वरूपपुरा उदयपुर
3 टंगस्टन
डेगाना भाकरी नागौर
वाल्दा बडाबेरा सिरोही
पडराला- बीजापुर पाली
4 सीसा-जस्ता
जावर उदयपुर
राजपुर दरीबा, बामनिया राजसमंद
रामपुरा आगुचा भीलवाडा
चौथ का बरवाडा सवाई माधोपुर
5 ताँबा
खेतड़ी सिंघाना झुंझुनू
खो-दरीबा अलवर
बीदासर चुरू
देलवाडा, केरवाली उदयपुर
पुर दरीबा भीलवाड़ा
6 सोना
आनंदपुर भुकिया, जगपुरा बांसवाड़ा
बासडी-बोरोदा दौसा
7 चाँदी
जावर उदयपुर
रामपुरा अगुचा भीलवाड़ा
8 बेरेलियम
शिकारवाड़ी, चम्पागुढा उदयपुर
देवड़ा भीलवाड़ा
बान्दर सिंदरी अजमेर

 

अधात्विक खनिज

1 एस्बेस्टॉस
ऋषभदेव, सलूम्बर उदयपुर
नाथद्वारा, तिनी राजसमंद
पीपरदा, देवल डूंगरपुर
2 फेल्सपार
मकरेरा, दादलिया अजमेर
चावण्डिया पाली
3 काँच बालुका
झर, कानोता, बांसरवी जयपुर
बडोदिया बूंदी
नारायणपुर-टटवारा सवाई माधोपुर
4 चीनी मिट्टी
वसुव, रायसीना सवाई माधोपुर
पाल जालौर
बुचारा, टोरडा, पुरूषोत्तमपुरा सीकर
5 फायर क्ले
कोलायत बीकानेर
बनिया खेडा भीलवाड़ा
एरल चित्तौड
6 डोलोमाइट
जयपुर 48%
अलवर 23%
सीकर 15%
7 वॉलेस्टोनाइट
बेल्का, खिल्ला सिरोही
रूपनगढ, पीसांगन अजमेर
उपरला खेड़ा, सायरा उदयपुर
8 क्वार्टज अजमेर, पाली, टोंक
9 अभ्रक
नात की नेरी भीलवाड़ा
चम्पागुढा उदयपुर
10 पन्ना (Emerald)
कालागुमान उदयपुर
टिक्की चित्तौड
गोगुन्दा गोगुन्दा
11 तामड़ा (Garnet)
राजमहल टोंक
सरवाड़ अजमेर
12 हीरा (Diamond)
केशरपुर चित्तौड़
अजमेर
13 चुना पत्थर
सानू क्षेत्र जैसलमेर
निम्बाहेड़ा, शम्भुपुरा चित्तौड़
लाखेरी, इन्द्रगढ बूंदी
गोटन, मूंडवा नागौर
14 जिप्सम (हरसौंठ, खडिया)
जामसर, थीरेश, सियासर, लूणकरणसर बीकानेर
बिसरासर गंगानगर
गोठ मंगलोद नागौर
15 रॉक-फॉस्फेट
झामरकोटडा उदयपुर
बिरमानियाँ जैसलमेर
सलोपेट बांसवाड़ा
16 पाइराइट्स
सलादीपुरा-खण्डेला सीकर
17 कोयला (लिग्नाइट)
फ्लाना, बरसिंगसर, हाडला बीकानेर
18 खनिज तेल
गुढ़ा मलानी, कवास, बायतू बाडमेर
सादेवाला, तनोट जैसलमेर
बाधेवाला बीकानेर
19 प्राकृतिक गैस
तनोट, घोटारू, डांडेवाला, मनिहारी जैसलमेर
रागेश्वरी बाड़मेर

 

मृदा

  • ICAR ने अमेरिका की USDA के आधार पर भारत की मिट्टियों को निम्नलिखित क्रम में वर्गीकृत किया है।
  1.     Inceptisole   39.7%
  2.     Entisole       28.08%
  3.     Alfisole       13.5%
  4.     Vertisole      8.5%
  5.     Aridisole     4.2%
  6.     Ultisole        2.5%
  7.     Mollisole     0.4%
  8.     Spodosole 2.9%
  9.     Histosole         2.9%
  10. Andisole 2.9%
  11. Oxisole 2.9%

_________               

100%

 

  • Inceptisole– इसमें गंगा, यमुना एवं ब्रह्मपुत्र घाटी की मृदाएं (बागड) आती है।
  • Entisole – नवीन जलोढ मृदा (खादर) इसमें आती है।
  • Alfisole – इसमें लेटराइटिक एवम लाल मृदाएं आती है।
  • Vertisole– इसमें काली मृदा आती है।
  • Aridsole– अधिकांश रूप में शुष्क क्षेत्र में पाई जाती है।
  • Ultisole– इसमे लाल-पीले रंग की मृदा आती है। प्रमुख रूप में केरल, तमिलनाडु, उड़ीसा में पाई जाती है।
  • Mollisole– इसमें Chestnut, Chernozem एवं प्रेयरी मृदा आती है। प्रमुख रूप से तराई, उत्तर पूर्व हिमालय के जंगलों की मृदा आती है।
  • Spodosole- इसमें पोडजोल मृदा आती है।
  • Histosole – इसमें पीट एवं दलदली मृदा सम्मिलित होती है।
  • Andisole– ज्वालामुखी मुहाने पर पाई जाती है।
  • Oxisole– सर्वाधिक अपक्षयित मृदा है। केरल में पाई जाती है। 

 

भारतीय मृदा की प्रमुख समस्याएँ

(1) मृदा अपरदन ( Soil Erosion  )

(2) उर्वरता में कमी ( Deficiency in Fertility)

(3) मरूस्थलीकरण ( Desertification )

(4) जलजमाव ( Waterlogging )

(5) लवणता एवं क्षारियता (Solini & Olkalinity)

 

मृदा अपरदन ( Soil Erosion  )

  • जल अपरदन –  9 प्रकार का होता है।

(1) क्षुद्र सरिता (Rill Erosion)

                              Gully Erosion

(2) अवनालिका (Gully Erosion)

(3) परत (Sheet Erosion)

(4) अपस्फुरण (Splash Erosion)→ Sand & Silt

(5) भूस्खलन (Slip Erosion)

(6) सरिता तट (Stream Bank Erosion)

(7) पीटिका (Pedestal Erosion)

(8) हिमानी (Glacier Erosion)

(9) सागरीय (Marine Erosion)

 

  • Marine Erosion

(1) पश्त अपरदन

 

लवणता एवं क्षारता 

लवणता (Salinity) – इसमें मृदा में सोडियम, केल्श्यिम एवं मेग्नेशियम के क्लोराईड एवं सल्फाईड की मात्रा अधिक हो जाती है। 

  • Rock Phosphate  से कम की जा सकती है।
  • लवण एवं क्षार युक्त मृदा को थूर कहा जाता है।
  • भारत में 2.43ः मृदा लवणता एवं क्षारता से ग्रस्त है।

 

  • क्षारता (Olkalinity) – इसके अंतर्गत सोडियम कारबोनेट की मात्रा अधिक हो जाती है।
  • जिप्सम के उपयोग से कम की जा सकती है।

 

राजस्थान की मिट्टियों का उनके भौगोलिक वितरण के आधार पर वर्गीकरण

 

1. रेतीली मृदा: वर्षा यहाँ न्यूनतम होती है। अरावली के पश्चिमी भाग में, रंग के आधार पर निम्न प्रकार की होती है।

       (1) रेतीली बालु: 10 से.मी. वर्षा वाले क्षेत्रों में गंगानगर, बीकानेर, चुरू, जोधपुर, जैसलमेर, बाडमेर, जालौर।

       (2) लाल-रेतीली मिट्टी: नागौर, जोधपुर, पाली, जालौर, चुरू, झुंझुनू।

      (3) भूरी रेतीली मिट्टी: इसे सिरोजम भी कहा जाता है। उर्वरता कम होती है। बाडमेर, जालौर, जोधपुर, सिरोही, पाली, नागौर, सीकर, झुंझुनू।

      (4) लवणीय मृदा: बीकानेर, नागौर, बाडमेर, जैसलमेर में पाई जाती है।

 

  1. जलोढ/कछारी मृदा: 
  • सर्वाधिक बनास प्रवाह में पाई जाती है।
  • अलवर, भरतपुर, धौलपुर, सवाई माधोपुर, कोटा, बूंदी
  • इसका रंग कहीं काला व कहीं भूरा है।

 

  1. लाल-पीली मृदा: इसका निर्माण ग्रेनाईट, शीष्ट व नीस चट्टानों से हुआ है। यह सवाई माधोपुर, भीलवाड़ा, अजमेर, सिरोही जिले में पाई जाती है।

 

  1. लाल – लोमीमृदा:
  • लोहांश की मात्रा अधिक पाई जाती है।
  • उत्पादकता सामान्य है।
  • उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, चित्तौड़
  • चावल, कपास, मक्का, गन्ना, गेहूँ, के लिए उपयुक्त

 

  1. लाल-काली मृदा:
  • मालवा के पठार का ही विस्तार है।
  • भीलवाड़ा, उदयपुर (पूर्वी), चित्तौड़, डूंगरपुर,बांसवाड़ा
  • सोयाबीन, कपास, मक्का, तिलहन

 

  1. मध्यम काली मृदा: राजस्थान के दक्षिण पूर्वी भागों में झालावाड़, बूंदी, बांरा, कोटा

 

राजस्थान की मृदा का वैज्ञानिक वर्गीकरण

  1. Aridisole:- मरूस्थलीय भाग में पाई जाती है। लवणता अधिक, जल ग्रहण क्षमता न्यून
  2. Alfisole :- रंग भूरा या लाल होता है। जयपुर, अलवर, भरतपुर, सवाई माधोपुर, टोंक, करौली, भीलवाड़ा, चित्तौड़, प्रतापगढ़, उदयपुर, बूंदी, डूंगरपुर
  3. Entisole :- राज्य के 36.8ः भाग में विस्तृत, पश्चिमी राजस्थान में
  4. Inceptisole:- आद्र एवं जलोढ़ मृदा के मध्य पाई जाती है। सिरोही, पाली, राजसमंद, उदयपुर, भीलवाड़ा, चित्तौड़
  5. Vertisole :- उष्ण व उपोष्ण कटिबंध में पाई जाती है, कपासी मृदा कहलाती है। हाडौती क्षेत्र में

 

राजस्थान में मृदा समस्याएँ

  • सेम समस्या
  • मरूस्थलीय प्रसार
  • खरपतवार
  • जैविक तत्वों की कमी
  • उर्वरता का कम होना
  • अम्लीयता व क्षारीयता

 

राजस्थान मृदा की विशेषताएँ

  • नाइट्रोजन, जीवांश तथा खनिज लवणों की कमी पाई जाती है।
  • भौतिक विघटन एवं रासायनिक अपघटन देखा जाता है।
  • क्षार एवं अम्लीयता अधिक पाई जाती है।

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10 Most Important Question Daily

10 Most Important Question Daily

Geetanjali Academy- By Jagdish Takhar

 

 

हम प्रतिदिन 10 प्रश्नों का अभ्यास लगातार आप को प्रदान करेगें ताकि परीक्षा तक हजारों अतिमहत्वपूर्ण सूचनाओं, तथ्यों ,योजनााओं का संकलन आप तक पहुँच सकें एवं आपकी परीक्षा की तैयारी को आप खुद जाँच सकें। 

 

1. किसी दी गई अवधि के लिये एक देश की राष्ट्रीय आय – 

(A) नागरिकों द्वारा उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं के कुल मूल्य के बराबर होगी। 

(B) कुल उपभोग और निवेश व्यय के योग के बराबर होगी। 

(C) सभी व्यक्तियों की व्यक्तिगत आय के योग के बराबर होगी। 

(D) उत्पादित अन्तिम वस्तुओं और सेवाओं के मौद्रिक मूल्य के बराबर होगी। 

 

2. किसी अर्थव्यवस्था में ब्याज की दर को घटाया जाता है तो वह – 

(A) अर्थव्यवस्था में उपभोग व्यय बढ़ायेगा 

(B) अर्थव्यवस्था में करसंग्रह को बढ़ायेगा।

(C) अर्थव्यवस्था में निवेश व्यय को बढ़ायेगा। 

(D) अर्थव्यवस्था में कुल बचत को बढ़ायेगा। 

 

3.भारत में बैंकों द्वारा प्राथमिक क्षेत्र ऋणदान से तात्पर्य किसको ऋण देने से है – 

(A) कृषि 

(B) लघु (माइक्रो) एवं छोटे उद्यम

(C) दुर्बल वर्ग 

(D) उपर्युक्त सभी 

 

4. जोखिम पूँजी से क्या तात्पर्य है ? 

(A) उद्योगों की उपलब्ध कराई गई अप्लकालीन पूँजी। 

(B) नये उद्यमियों को उपलब्ध कराई गई दीर्घकालीन पारम्भिक पूँजी। 

(C) उद्योगों को हानि उठाते समय उपलब्ध कराई गई निधियाँ। 

(D) उद्योगों के प्रतिस्थापन एवं नवीकरण के लिये उपलब्ध कराई गई निधियाँ। 

 

5. साल दर साल लगातार घाटे का बजट रहा है। घाटे को कम करने के लिये सरकार द्वारा निम्नलिखित में से कौनसी कार्यवाही/कार्यवाहियों की जा सकती है- 

(1) राजस्व व्यय को घटाना 

(2) नवीन कल्याणकारी योजनाओं को प्रारम्भ करना। 

(3) सहायिकी (सब्सिडी) को युक्तिसंगत बनाना। 

(4) आयात शुल्क को कम करना। 

नीचे दिये गये कूट का प्रयोग कर सही उत्तर को चुने

कूट:

(A) केवल 1 

(B) केवल 2 और 3 

(C) केवल 1 और 3 

(D) 1, 2, 3, और 4 

 

6. निम्नलिखित में से किस पर कोई आयकर छूट नहीं है 

(A) किसान विकास पत्र 

(B) राष्ट्रीय बचत पत्र 

(C) लोक भविष्य निधि 

(D) यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस योजना 

 

7. प्रच्छन्न बेरोजगारी को सामान्यतः अर्थ होता है कि – 

(A) लोग बड़ी संख्या में बरोजगार रहते है। 

(B) वैकल्पिक रोजगार उपलब्ध नहीं होता है। 

(C) श्रमिक की सीमान्त उत्पादकता शून्य हो जाती है। 

(D) श्रमिकों की उत्पादकता नीची होती है। 

 

8. भारतीय अर्थव्यवस्था के सन्दर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए –

  1. सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) में विगत एक दशक में चार गुना वृद्धि हुई।
  2. सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) मंे सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिशत अंश में विगत एक दशक में कमी आई हैं

उपरोक्त में से कौनसा/कौनसे कथन सही है – 

(A) केवल 1 

(B) केवल 2 

(C) 1 और 2 दोनों 

(D) न तो 1 और न ही 2 

 

9. ट्रांस पेसिफिक पार्टनरशिप (ज्तंदे च्ंबiiिब च्ंतजदमतेीपच) के सन्दर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए –

  1. मध्य एक समझौता है।
  2. यह केवल तटवर्ती सुरक्षा के प्रयोजन से किया गया सामरिक गठबंधन है।

नीचे दिये गये कूट का प्रयोग कर सही उत्तर का चयन कीजिए –

(A) केवल 1

(B) केवल 2 

(C) 1 और 2 दोनों 

(D) न तो 1 और न ही 2 

 

10. प्रधानमंत्री मुद्रा योजना का लक्ष्य क्या है –

(A) लघु उद्यमियों को औपचारिक वित्तीय प्रणाली में लाना।

(B) निर्धन कृषकों को नगदी फसलों की कृषि के लिये ऋण उपलब्ध करना। 

(C) वृद्ध व निःसहाय लोगों को पेंशन देना। 

(D) कौशल विकास एवं रोजगार सृजन में लगे स्वयंसेवी संगठनों का निधीकरण (फंडिंग) करना।

 

Answer Sheet 
Question 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10
Answer D C D B C A C B A A

 

10 Most Important Question Daily  

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1. ऑप्टिकल फाइबर कार्य करता है –

(A) प्रकाश का अपवर्तन

(B) प्रकाश का परावर्तन

(C) प्रकाश का प्रर्कीर्णन

(D)पूर्ण आंतरिक परावर्तन

 

2. ऑप्टिकल फाइबर के बारे में सत्य कथनों का कूट बनायें –

(1) ऑप्टिकल फाइबर के निर्माण में रिलाइंस इंउस्ट्रीज, भारत की सबसे बड़ी कंपनी है।

(2) ऑप्टिकल फाइबर का प्रयोग करने वाला मध्य प्रदेश देश का पहला राज्य है।

(3) ऑप्टिकल फाइबर की पहली लाइन पूणे के शिवाजी नगर से छावनी के बीच बिछायी गयी।

(4) ऑप्टिकल फाइबर 0.005 मिमी. की पतली बेलनाकार नलिकाएं होती हैं।

 

उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन सत्य है/हैं ?

(A) 1 व 3 

(B) (2),(3), व (4)

(C) (1) (2),(4)

(D) उपरोक्त सभी

 

3. नाभिकीय रिएक्टर और परमाणु बम में क्या अंतर है –

(A) नाभिकीय रिएक्टर में कोई श्रृंखला अभिक्रिया नहीं होती जबकि परमाणु बम में होती है।

(B) नाभिकीय रिएक्टर में श्रृंखला अभिक्रिया नियंत्रित होती है।

(C) नाभिकीय रिऐक्टर मे श्रंृखला अभिक्रिया नियंत्रित नही होती है।

(D) परमाणु बम में श्रंृखला अभिक्रिया नहीं हाती है जबकि नाभिकीय रिऐक्टर में होती है।

 

4. निम्नलिखित में से कार्बोहाइड्रेट का कार्य है –

(1) ऑक्सीजन द्वारा शरीर की ऊर्जा की आवश्यकता की पूर्ति करना

(2) शरीर में भोजन संचय के समान कार्य करना

(3) न्यूक्लिक अम्लों का निर्माण करना तथा अन्य पदार्थों के निर्माण के लिए कच्चे पदार्थों के रूप में कार्य करना

(4) जन्तुओं के बाह्य कंकाल का निर्माण करना

कूट

(A) 1 व 2

(B) 3 और 4

(C) 1,2 और 4

(D) उपरोक्त सभी

 

5. निम्नलिखित में आसत्य है –

(A) अग्नाशय मानव शरीर की दूसरी सबसे बड़ी ग्रंथि है।

(B) अग्नाशय, इन्सुलिन के रक्त में शर्करा की मात्रा को नियंत्रित करता है।

(C) इसके अल्प स्त्रावण से मधुमेह नामक रोग हो जाता है।

(D) जन्तुओं के बाह्य कंकाल का निर्माण करना

 

6. ‘द्रव सोना’ के नाम से जाना जाता है –

(A) पेट्रोलियम

(B) प्लेटिनम

(C) एक्वारेजिया

(D) पायरीन

 

7. ‘किस पेट्रोलियम कम्पनी ने ‘स्पीड’ नामक एक उच्च गुणवत्ता वाले पेट्रोल को बाजार में उतारा है?

(A) भारत पेट्रोलियम

(B) इण्डियन ऑयल

(C) हिन्दुस्तान पेट्रोलियम

(D) सेल

 

8. एल.पी.जी. में मुख्यतः होती है –

(A) मिथेन, इथेन व हेक्सेन

(B) मिथेन, इथेन व नोनेन

(C) मिथेन, प्रोपेन व ब्यूटे

(D) इथेन, ब्यूटेन व हेक्सेन

 

9. जेट इंजन किस सिद्धांत पर कार्य करता है? – 

(A) द्रव्यमान संरक्षण 

(B) ऊर्जा संरक्षण 

(C) रैखिक संवेग संरक्षण 

(D) कोणी संवेग संरक्षण

 

10. ट्रांसफार्मर कार्य करते है – 

(A) केवल दिष्टधारा से 

(B) प्रत्यावर्ती धारा से 

(C) दिष्ट एवं प्रत्यावर्ती दोनों 

(D) उपरोक्त में कोई नहीं

 

Answer Sheet 
Question 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10
Answer D D B D C A A C C B

राजस्थान के ऐतिहासिक स्रोत

राजस्थान के ऐतिहासिक स्रोत

Geetanjali Academy- By Jagdish Takhar

 

 

राजस्थान में स्थापत्य कला

  • राजस्थान में स्थापत्य का प्राचीनतम प्रमाण कालीबंगा से प्राप्त होता है। जहाँ ईंटों के भवनों में निवास का प्रमाण मिलता है। 
  • मौर्य कालीन अवशेषों से भी यहाँ स्थापत्य की निरंतरता का बोध होता है जिनमें बैराठ, माध्यमिका (नगरी, चित्तौड़) प्रमुख है। 
  • गुप्त एवं गुप्तोत्तर काल में मेनाल, अमझेरा, डबोक इत्यादि के अवशेष उललेखनीय है। 
  • महाराणा कुंभा से पूर्व भवन निर्माण कार्य सुव्यवस्थित नहीं था। 
  • इस काल के स्थापत्य में शक्ति एवं सुरक्षा की भावना स्पष्ट दिखाई देती है। 
  • कंभा की वास्तुकला पर मंडन के गंथों का प्रभाव दिखाई देता है। 

(1) प्रासाद मंडन

(2) रूप मंडन

(3) रूपावतार मंडन

(4) गृह मंडन

(5) वास्तुसार मंडन

(1) नगर निर्माण 

  • प्रारंभिक आधार-अर्थशास्त्र एवं महाभारत
  • स्थान का चयन सुरक्षा के आधार पर – आमेर, अजमेर बूँदी।
  • आमेर प्रथम राज्य था जिसकी शैली पर सर्वप्रथम मुगल प्रभाव पड़ा।

दुर्ग निर्माण 

शुक्र नीति में 9 प्रकार के दुर्ग बताये गये हैं –

(1) एरण दुर्ग (2) पारिख दुर्ग (3) पारिध दुर्ग 

(4) वन दुर्ग (5) धन्व दुर्ग (6) जल दुर्ग 

(7) गिरि दुर्ग (8) सैन्य दुर्ग तथा (9) सहाय दुर्ग ।

 

राजस्थान के प्रमुख दुर्ग

क्रं0सं0 दुर्ग का नाम स्थान निर्माता दुर्ग श्रेणी
  • 1.
चित्तौड़ दुर्ग चित्तौड़गढ़ चित्रागंद मौर्य गिरि दुर्ग
  • 2.
कुम्भलगढ़ दुर्ग मेवाड़-मारवाड़  राणा कुम्भा गिरि दुर्ग
3. रणथम्भौर दुर्ग सवाईमाधोपुर महेश ठाकुर एरण दुर्ग
4. सिवाणा दुर्ग सिवाना वीरनारायण पवांर वन दुर्ग
5. तारागढ़ दुर्ग (गठबीडली दुर्ग) अजमेर अजयपाल गिरि दुर्ग
6.  गागरौण दुर्ग गागरौण खींची वंश जल दुर्ग
7. जैसलमेर दुर्ग जैसलमेर भाटी राजवंश धान्वन दुर्ग
8. जूनागढ़ दुर्ग बीकानेर रायसिंह स्थल दुर्ग
9. दूदू का दुर्ग अजमेर-जयपुर मार्ग श्यामसिंह स्थल दुर्ग
10. नागौर का दुर्ग नागौर राठौड़ सावंत स्थल दुर्ग
11. मेहरानगढ़ दुर्ग जोधपुर राव जोधा गिरि दुर्ग
12. लोहागढ़ दुर्ग भरतपुर सूरजमल स्थल दुर्ग
13.  भटनेर दुर्ग हनुमानगढ़ नरेश भूपत जल दुर्ग

 

राजस्थान के प्रमुख दुर्ग एवं दुर्ग शिल्प

 

  • राजस्थान की स्थापत्य कला में सबसे प्रमुख स्थान राजपूतों का रहा है। मुगलकाल में राजस्थान की स्थापत्य कला पर मुगलशैली का प्रभाव पड़ा। आमेर (जयपुर) राजस्थान का पहला राज्य था, जिसकी स्थापत्य कला पर सर्वप्रथम मुगलशैली का प्रभाव पड़ा क्योंकि इस राज्य ने सबसे पहले सन् 1563-64 में मुगलों सम्बन्ध स्थापित किये थे। राणा कुम्भा को राजस्थान की स्थापत्य कला का जनक माना जाता है, जो स्वयं अपने शिल्पी मण्डल द्वारा रचित वास्तुकला के पाँच ग्रंथों से प्रभावित था। शिल्पी मण्डल ने 15वीं शताब्दी में निम्न पाँच प्रमुख ग्रंथ लिखे:
  • प्रसाद मण्डल: मन्दिरों/देवालयों के निर्माण सम्बन्धी निर्देश इस ग्रन्थ में हैं।
  • प्रासाद मण्डल: इसमें सामान्य व्यक्तियों के गृह, कुँआ, बावड़ी, तालाब, किला, राजमहल आदि के निर्माण सम्बन्धी जानकारी है।
  • रूप मण्डल: इसमें मूर्ति निर्माण सम्बन्धी जानकारी है।
  • रूपावतार मण्डल: इसमें भी मूर्तियों के निर्माण सम्बन्धी जानकारी है।
  • वास्तुकार मण्डल: इसमें वास्तुशास्त्र सम्बन्धी जानकारी है।
  • जयपुर नगर का निर्माण सवाई जय सिंह द्वितीय के समय प्रारम्भ हुआ। इनके राजगुरु पंडित जगन्नाथ सम्राट ने सन् 18 नवम्बर 1727 में जयपुर की नींव रखी। हिन्दू कारीगरों ने मुस्लिम आदेशों से जो भवन बनाये उन्हें सुप्रसिद्ध कलामर्मज्ञ फर्ग्युसन ने इंडो-सोरसेनिक शैली की संज्ञा दी है। महाराणा कुम्भा द्वारा निर्मित सभी मन्दिर प्रस्तर युग की शैली के हैं। महाराणा कुम्भा द्वारा निर्मित सभी मन्दिरों के गुम्बद नागर शैली के हैं। राजस्थान किलों का घर है। यहाँ प्रत्येक 16 कि.मी. की दूरी पर एक किले के दर्शन हो जाते हैं। मेवाड़ में 48 किले हैं जिसमें से 32 किलों का निर्माण अकेले महाराणा कुम्भा ने करवाया था तथा मारवाड़ में सर्वाधिक किले राव मालदेव ने बनाये थे। राजस्थान में सर्वाधिक दुर्ग जयपुर जिले (79) में हैं। राजस्थान के राजपूतों ने नगरों और प्रसादों का निर्माण पहाड़ियों में किया। क्योंकि वहाँ शत्रुओं के विरूद्ध प्राकृतिक सुरक्षा के साधन थे। शुक्रनीति के अनुसार राज्य के सात अंग माने गये हैं, जिसमें से एक दुर्ग है। दुर्ग की तुलना मानव के हाथ से की गई है। शुक्रनीतियों ने दुर्गों के 9 भेद बताये हैं।

 

(i) एरण दुर्ग:  ऐसा दुर्ग जो खाई, कांटों और कठोर पत्थरों से युक्त हो, जिससे दुर्ग तक पहुँचना कठिन हो, एरण दुर्ग कहलाता है, जैसे: रणथम्भौर दुर्ग।

(ii) पारिख दुर्ग: ऐसा दुर्ग जिसके चारों ओर खाई हो, जैसे: भरतपुर का लोहागढ़ दुर्ग।

(iii) पारिध दुर्ग: ऐसा दुर्ग जिसके चारों ओर ईट, पत्थर तथा मिट्टी से बनी बड़ी-बड़ी दीवारों का परकोटा हो, जैसे: चित्तौडगढ़ एवं कुम्भलगढ़ दुर्ग।

(iv) वन दुर्ग: वह दुर्ग जो बहुत बड़े-बड़े कांटेदार वृक्षों के समूह से चारों तरफ से घिरा हो, जैसे: सिवाणा दुर्ग (बाड़मेर)।

(v) धन्व/धान्वन दुर्ग: ऐसा दुर्ग जिसके चारों तरफ बहुत दूर तक मरूभूमि (धोरें) फैली हो, जैसे: जैसलमेर दुर्ग।

(vi) जल दुर्ग/औदक दुर्ग: वह दुर्ग जिसके चारों तरफ दूर तक जल राशि विस्तृत हो, जैसे: गागरोन दुर्ग (झालावाड़)।

(vii) गिरि दुर्ग: एकान्त में किसी पहाड़ी पर बना किला जिस पर जल संचय का भी प्रबन्ध हो, गिरि दुर्ग कहलाता है, जैसे: तारागढ़ दुर्ग (बूँदी)।

(viii) सैन्य दुर्ग: वह दुर्ग जिसकी व्यूह रचना चतुर वीरों के होने से अभेध हो, सैन्य दुर्ग कहलाता है। यह दुर्ग सभी दुर्गों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

(ix) सहाय दुर्ग: ऐसा दुर्ग जिसमें वीर एवं सदा साथ देने वाले बंधुजन रहते हों, सहाय दुर्ग कहलाता है।

 

    1. भटनेर दुर्ग (हनुमानगढ़): इस दुर्ग के संस्थापक भूपत सिंह भाटी थे। यह राजस्थान की उत्तरी सीमा का प्रहरी कहलाता है। इस दुर्ग के बारे में तैमूरलंग ने कहा है: ‘‘मैंने इतना मजबूत व सुरक्षित किला पूरे हिंदुस्तान में कहीं नहीं देखा‘‘। सर्वाधिक आक्रमण झेलने वाला यह दुर्ग राजस्थान का सबसे प्राचीन दुर्ग है। सूरत सिंह (बीकानेर) द्वारा मंगलवार को इसे अधिकार में लेने के कारण इसका नाम हनुमानगढ़ रखा गया तथा इसमें हनुमान मंन्दिर भी बनवाया गया था।
    2. चुरू का किला (चुरू): इस दुर्ग के संस्थापक कुशल सिंह थे। सन् 1814 में बीकानेर के शासक सूरत सिंह द्वारा आक्रमण करने पर यहाँ के ठाकुरों ने गोला बारूद खत्म होने पर दुश्मनों पर चाँदी के गोले दागे थे। इस समय चुरू के शासक शिवाजी सिंह थे। इस दुर्ग में विख्यात गोपीनाथ मन्दिर है।
    3. सोनारगढ़ दुर्ग/त्रिकूटगढ़ दुर्ग (जैसलमेर): इस दुर्ग के संस्थापक राव जैसल थे। इस दुर्ग को उत्तर भड़ किवाड़ (उत्तरी सीमा का प्रहरी) कहा जाता है। इस किले में जैसलू कुँआ है, जिसका निर्माण भगवान श्रीकृष्ण के सुदर्शन चक्र से हुआ। माना जाता है इसलिये भाटी राजपूत अपने आप को भगवान श्रीकृष्ण का वंशज मानते हैं। इस दुर्ग को यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थलों की सूची में शामिल किया गया हैं। अबुल फजल ने इस दुर्ग के बारे में कहा है कि ‘यहाँ तक पहुँचने के लिये पत्थर की टाँगे चाहिये‘। सूर्योदय व सूर्यास्त के समय जब सूर्य की लालीमायुक्त किरणें इस किले पर पड़ती हैं तो यह सोने के समान चमकता है। इसीलिये यह सोनारगढ़ कहलाता है। पीले पत्थरों से निर्मित इस दुर्ग में चूने का प्रयोग नहीं किया गया, बल्कि पत्थरों में स्लॉट बनाकर उन्हें आपस में जोड़ा गया है। इस किले को दूर से देखने पर ऐसा लगता है मानो रेत के समुद्र में कोई विशाल जहाज लंगर डाल खड़ा हो। इस दुर्ग का प्रवेश द्वार अक्षयपोल कहलाता है तथा इस किले में 99 बुर्जे। हैं। यह चित्तौडगढ़ दुर्ग के बाद दूसरा सबसे बड़ा लिविंग फोर्ट है। इस दुर्ग में हस्तलिखित ग्रंथों के दुर्लभ भ.डार है, जिन्हें जिनभद्रसूरी ग्रंथ भ.डार कहा जाता है। इस किले पर फिल्म निर्देशक सत्यजीत रे द्वारा ‘सोनार किला‘ नामक फिल्म बनाई गई। इस किले में 2(ढ़ाई) साके होने के प्रमाण मिले हैं। पहला: अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय, दूसरा: फिरोजशाह तुगलक के आक्रमण के समय तथा तीसरा: अर्द्ध साका लूणकरण के शासन काल में हुआ, जिसमें पुरूषों ने तो केसरिया किया, लेकिन महिलाएँ जौहर न कर सकी।

 

  • सोजत दुर्ग (सोजत सिटी, पाली) 

 

  • माण्डलगढ़ दुर्ग (माण्डलगढ़, भीलवाड़ा): इसका निर्माण चानणा गुर्जर द्वारा पुननिर्माण राणा कुम्भा द्वारा करवाया गया था। यह बीजासन व नकटियाँ की चौढ़ पहाड़ी पर बनास, बेडच व मेनाल नदियों के संगम पर स्थित है। यहाँ पर सिद्ध योगियों के आवास के प्रमाण तथा मत्स्येन्द्र नाथ से सम्बन्धित 1000 वर्ष पुराना शिलालेख प्राप्त हुआ है।
  • तारागढ़ दुर्ग (बूँदी): इस दुर्ग के संस्थापक वर सिंह थे। इस किले की स्थिति आकाश में तारे के समान होने के कारण इसे तारागढ़ कहा जाता है। इस किले में गर्भगुंजन तोप स्थित हैं। रूडयार्ड किप्लिंग इस किले में स्थित सुख महल  में ठहरे थे। राव उम्मेद सिंह द्वारा निर्मित चित्रशाला इसी किले में स्थित है।
  • गागरोन दुर्ग (गागरोन, झालावाड़): यह आहू तथा कालीसिंध नदियों के संगम पर मुकन्दरा पहाड़ी पर स्थित ‘बिना नींव के सीधा खड़ा‘ एक जलदुर्ग है। प्राचीन काल में यह टॉडगढ़/ धूलरगढ़/गर्गराटपुर कहलाता था। इस दुर्ग में कोटा रियायत की टकसाल (सिक्के ढ़ालने हेतु) थी। इस दुर्ग में शत्रु पर पत्थरों की वर्षा करने वाला यंत्र आज भी मौजूद है। औरंगजेब द्वारा निर्मित प्रसिद्ध सूफी संत हमीमुद्दीन चिश्ती (मिट्ठे शाह) की समाधि इस दुर्ग में हैं। यहाँ संत पीपा की छतरी भी स्थित है। औरंगजेब ने इसमें बुलंद दरवाजे का निर्माण करवाया था। इसमें मधुसूदन (भगवान श्रीकृष्ण), शीतला माता मन्दिर तथा जालिम सिंह द्वारा निर्मित परकोटा स्थित है।

 

 

  • अचलदास खींची री वचनिका: शिवदास गाडण ने अपने इस ग्रंथ में मालवा के शासक हुशंगशाह के गागरोन दुर्ग पर आक्रमण तथा उसके अचलदास के साथ युद्ध का वर्णन किया है, जिसमें  अचलदास मारे गये थे।
    1. शेरगढ़ का किला (धौलपुर): शेरशाह सूरी द्वारा इसका जीर्णोद्धार व पुनर्निमाण करवाया गया था। इसलिये यह शेरगढ़ कहलाता है। यह किला दक्षिण के द्वारगढ़ के रूप में प्रसिद्ध था। हनुहुँकार तोप धौलपुर में ही स्थित हैं।
    2. सुवर्ण गिरि (जालौर): इसका निर्माण परमार शासकों द्वारा करवाया गया था। मलिक शाह पीर की दरगाह यहीं पर स्थित है। पद्मनाभ द्वारा कान्हडदे प्रबंध काव्य में अलाउद्दीन खिलजी तथा कान्हडदे के युद्ध तथा इस किले पर आक्रमण (सन् 1309) का वर्णन है।

 

  • सिंघाना का किला (झुंझुनू)।

 

  • फतेहपुर दुर्ग (फतेहपुर, सीकर)।

 

 

    1. मंडरायल का दुर्ग (करौली): यहाँ पर मर्दानशाह की दरगाह स्थित है। यह दुर्ग ग्वालियर दुर्ग की कुंजी माना जाता था।
    2. बाला दुर्ग/अलवर का किला (अलवर): इसका निर्माण हसन खाँ मेवाती ने करवाया था। अकबर द्वारा अपने गुमराह पुत्र सलीम को इसी किले में नजरबंद करके रखा गया था।
    3. काकण बाड़ी का किला (राजगढ़, अलवर): इस किले में औरंगजेब ने अपने भाई दाराशिकोह को कैद करके रखा था।
    4. जूनागढ़/बीकानेर का किला (बीकानेर): इसका निर्माण राय सिंह द्वारा करवाया गया था। यह लाल पत्थर से निर्मित चतुष्कोण/चतुर्भुज आकृति वाला किला है। इस दुर्ग में सूरजपोल द्वार में हाथियों पर सवार जयमल राठौड़ व पत्ता सिसोदिया की मूर्तियाँ है, जो अपने शानदार शिल्प के लिये विख्यात हैं। यहाँ पर प्रथम विश्व युद्ध के समय का विमान भी रखा हुआ है।
    5. लालगढ़ का किला (बीकानेर): इस किले के संस्थापक गंगा सिंह थे।
    6. मेहरानगढ़/मयूर ध्वज/गढ़ चिंतामणि (जोधपुर)ः इस किले का निर्माण राव जोधा द्वारा करवाया गया था। यह दुर्ग चिड़ियानाथ की तपोस्थली, चिड़ियाटूंक पहाड़ी पर स्थित है। मोर जैसी आकृति होने के कारण यह मयूर ध्वज कहलाता है। जैकलिन कैनेडी ने मेहरानगढ़ दुर्ग को विश्व के आश्चर्य की संज्ञा दी थी। ब्रिटेन के पत्रकार रूडयार्ड किप्लिंग ने इस दुर्ग के बारे में लिखा था कि ‘‘इस दुर्ग का निर्माण देवताओं, परियों और फरिश्तों की करामात है‘‘। यहाँ पर किलकिला, शम्भुबाण और गजनी खाँ तोपें स्थित है।
    7. मंडोर दुर्ग (म.डौर, जोधपुर)
    8. अहिछत्रपुर दुर्ग/नाग दुर्ग/नागाणा दुर्ग/नागौर का किला (नागौर): अकबर द्वारा इस किले में शुक्र तालाब का निर्माण करवाया गया था। अकबर ने यहाँ आठ माह तक दरबार लगाया था तथा  राजस्थान के विभिन्न राजाओं ने उसकी अधीनता यहीं स्वीकार की थी। युनेस्को ने इस किले के बेहतरीन रख-रखाव हेतु ‘युनेस्को सील ऑफ एक्सीलेन्स‘ अवार्ड दिया था। प्रिंस चार्ल्स व कैमिला पार्कर द्वारा इस किले का अवलोकन किया गया था।
    9. कुचामन का किला (कुचामन, नागौर)
    10. सिवाणा दुर्ग (सिवाणा, बाड़मेर): यह छप्पन की पहाड़ियों में हल्देश्वर पहाड़ी पर स्थित एक गिरि दुर्ग हैं। इसके निर्माता वीर नारायण पँवार थे। अलाउद्दीन खिलजी ने इसका नाम खैराबाद रखा था। इस किले को जालौर की कुँजी भी कहा जाता था। जय नारायण व्यास जो शेर-ए- राजस्थान के नाम से जाने जाते है, इस किले में बंदी बनाकर रखे गये थे। यह मारवाड़ के शासकों की संकटकालीन शरण स्थली तथा  राव चंद्रसेन की संकटकालीन राजधानी कहलाता था।
    11. कोटड़ा का किला (कोटड़ा गाँव, शिव तहसील, बाड़मेर): इस दुर्ग की स्थापना परमार शासकों द्वारा करवाई गई थी।
    12. अचलगढ़ दुर्ग/आबू का दुर्ग (आबू , सिरोही): इसकी स्थापना परमार शासकों द्वारा की गई तथा पुनर्निर्माण राणा कुम्भा द्वारा करवाया गया था। इसमें गौमुख मन्दिर स्थित है, जिसमें सर्वधातु की 14 मूर्तियाँ हैं।
    13. बसंतगढ़ दुर्ग (सिरोही)
    14. कुम्भलगढ़/कुम्भल मेरू दुर्ग (कुम्भलगढ़, राजसमंद): इसकी स्थापना महाराणा कुम्भा द्वारा अपनी पत्नी की स्मृति में करवाई थी। इस दुर्ग का शिल्पी मण्डल था। जरगा पहाड़ी पर स्थित यह दुर्ग मेवाड़ की आँख कहलाता था। यह राजस्थान का दूसरा सबसे पुराना दुर्ग है। इस दुर्ग में ही एक और दुर्ग बना हुआ है, जिसे कटारगढ़ कहा जाता है। कटारगढ़ में ही महाराणा प्रताप का जन्म हुआ था। अबुल फजल  ने इसके बारे में कहा है कि ‘‘यह दुर्ग इतनी बुलन्दी पर बना है, कि नीचे से ऊपर देखने पर सिर की पगड़ी गिर जाती है‘‘। महाराणा कुम्भा का महल तथा झाला रानी का मालिया महल भी कटारगढ़ में ही स्थित है। कुम्भ स्वामी/विष्णु मन्दिर तथा मामा देव मन्दिर भी यहीं स्थित हैं। इसकी प्राचीर (दीवार) इतनी विशाल है कि तीन से चार घोड़े एक साथ चल सकते है। यह दूर से न दिखाई देने वाला दुर्ग है। उदय सिंह का राज्याभिषेक इस दुर्ग में हुआ था। पन्नाधाय द्वारा अपने पुत्र चन्दन का बलिदान इसी दुर्ग में दिया गया था। महाराणा कुम्भा की हत्या उसके पुत्र ऊदा ने इसी दुर्ग में की थी। सुदृढ़ प्राचीर, बुर्जों एवं कंगूरो के कारण कर्नल टॉड ने इसकी तुलना एट्रस्कन से की है।

 

  • तोहन दुर्ग (कांकरोली, राजसमंद)।

 

  1. चित्तौडगढ़ दुर्ग (चित्तौडगढ़): इसकी स्थापना चित्रांगद मौर्य द्वारा करवाई गई थी। यह गम्भीरी व बेड़च नदियों के संगम के समीप ‘मेसा के पठार‘ पर निर्मित है। यह राजस्थान का सबसे बड़ा व सर्वश्रेष्ठ दुर्ग है। यह राजस्थान का गौरव, चित्रकूट, राजस्थान का सर्वश्रेष्ठ गिरि दुर्ग तथा राजस्थान के किलों का सिरमौर कहलाता है। इसलिये ‘‘गढ़ तो चित्तौडगढ़ बाकी सब गढ़ैया‘‘ कहावत मशहूर है। यह दुर्ग राजस्थान का दक्षिणी-पूर्वी द्वार कहलाता है, जिसके सात प्रवेश द्वार है। यह राजस्थान का सबसे प्राचीन व बड़ा लिविंग फोर्ट है। चित्तौडगढ़ मालवा तथा गुजरात से राजस्थान की रक्षा करने वाला केन्द्र स्थल था। अलाऊद्दीन खिलजी ने इसका नाम खिज्राबाद रखा था। इस दुर्ग में रानी पद्मिनी का महल, गोरा-बादल का महल, भामाशाह की हवेली, जयमल-पत्ता की छतरियाँ, मीरा मन्दिर, कुम्भ श्याम मन्दिर, श्रृंगार चँवरी, फतह प्रकाश महल, कुम्भा महल, रैदास की छतरी, सतबीस देवरी (जैन मन्दिर), समिद्धेश्वर मन्दिर, गौमुख कुंड, कालिका माता का मन्दिर आदि स्थित है।

 

  • कीर्ति स्तम्भ: यह जैनियों के आराध्य आदिनाथ जी का स्मारक है, जिसका निर्माण 11वीं-12वीं शताब्दी में बघेरवाल जैन जीजा द्वारा गुजरात शैली से करवाया गया था।
  • विजय स्तम्भ: यह एक 9 मंजिला/9 ख.डा महल है, जिसका निर्माण राणा कुम्भा ने मालवा विजय (सन् 1440 में सारंगपुर युद्ध में महमूद खिलजी को हराया) के उपलक्ष्य में करवाया था। यह 122 फीट ऊँचा, 9 मंजिला व 157 सीढ़ियों वाला भवन है। यह शिल्पी मण्डल के शिल्प दर्शन पर आधारित है, जिसका शिल्पी जैता था। इसे विष्णु मन्दिर/विष्णु स्तम्भ/हिन्दू मूर्तिकला का अनमोल खजाना/मूर्तियों का शब्दकोष/ मूर्तियों का अजायबघर कहा जाता है।
  • प्रसिद्ध साके: इस दुर्ग में तीन साके हुये थे।

 

(i) 1303 ई.: अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय रत्न सिंह की पत्नी पद्मिनी ने जौहर किया था।

 

(ii)  1534 ई.: गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह को आक्रमण के समय महाराणा विक्रमादित्य की संरक्षिका तथा माता कर्मावती द्वारा जौहर किया गया था।

 

(iii)    1567 ई.: उदय सिंह के काल में अकबर के आक्रमण के समय तीसरा जौहर हुआ था।

 

    1. भैंसरोडगढ़ दुर्ग (भैंसरोडगढ़, चित्तौडगढ़): इसका निर्माण भैंसा शाह व रोड़ा चारण बंजारे द्वारा करवाया गया था। यह चम्बल व बामनी नदियों के संगम पर स्थित दुर्ग है, जिसे राजस्थान का वैल्लोर कहा जाता है।
    2. शेरगढ़/कोशवर्धन दुर्ग (बांरा): परवन नदी के किनारे स्थित यह दुर्ग जलदुर्ग एवं वनदुर्ग दोनों ही श्रेणियों में आता है।
    3. शाहबाद दुर्ग (बांरा): यह दुर्ग मुकन्दरा पहाड़ी  पर स्थित है। नवलबाण तोप इसी दुर्ग में स्थित हैं।
    4. कोटा का किला (कोटा): इस दुर्ग की स्थापना माधों सिंह ने की थी। चम्बल नदी के किनारे स्थित इस किले को 1857 की क्रान्ति की महत्वपूर्ण स्थल माना जाता है। मेजर बर्टन का सिर कोटा में ही काटा गया था।

 

  • इन्दरगढ़ का किला (इन्दरगढ़, कोटा)।

 

  1. रणथम्भौर दुर्ग (रणथम्भौर, सवाई माधोपुर): इसका निर्माण महेश ठाकुर द्वारा करवाया गया था। यह दुर्ग दुर्गाधिराज कहलाता है। अरावली की सात श्रृंखलाओं से घिरा होने के कारण अबुल फजल ने कहा है कि ‘‘और दुर्ग तो नंग है, परन्तु यह बख्तरबंद है‘‘। इस दुर्ग में   त्रिनेत्र गणेश मन्दिर, पीर सदरूद्दीन की दरगाह, सुपारी महल, जौंरा-भौंरा एवं रनिहाड़ तालाब दर्शनीय स्थल है।
  • हम्मीर देव चौहान: यह दुर्ग हम्मीर की आन-बान का प्रतीक माना जाता है। 1301 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने इस दुर्ग पर आक्रमण किया तथा हम्मीर वीर गति को प्राप्त हुआ था।
  1. खण्डार का किला (सवाई माधोपुर): यह रणथम्भौर दुर्ग का सहायक दुर्ग था। इस किले में अष्टधातु से निर्मित शारदा तोप रखी है, जो अपनी मारक क्षमता के लिये प्रसिद्ध थी।
  2. असीरगढ़/भूमगढ़ का किला (टोंक)।
  3. चौबुर्ज दुर्ग/पचेवर का किला (पचेवर, टोंक)।
  4. काकोड़ का किला (काकोड़, टोंक)।
  5. तारागढ/अजयमेरू/गढ़ बीठली (अजमेर): इस किले के संस्थापक अजयराज थे। इस किले में पृथ्वीराज ने महल बनवाकर अपनी पत्नी ताराबाई के नाम पर इसका नाम तारागढ़ कर दिया गया। इसे अरावली का अरमान भी कहते हैं। बीठली पहाड़ी पर होने के कारण इसका नाम गढ़बीठली  भी है। विशप हैबर ने इसे पूर्व का दूसरा जिब्राल्टर कहा है। अतः इसे राजस्थान का जिब्राल्टर भी कहते है। मीरा साहिब की दरगाह तथा भारत की एकमात्र घोड़े की मजार इसी दुर्ग में ही स्थित है। मालदेव की पत्नी, रूठी रानी उम्मादे को भी इसी दुर्ग में रखा गया था। 
  6. केहरीगढ़ का किला (किशनगढ़, अजमेर)।
  7. मैग्जीन का किला/अकबर का दौलतखाना (अजमेर): इस किले का निर्माण अकबर द्वारा करवाया गया था। यह राजस्थान का एकमात्र दुर्ग है, जो मुस्लिम निर्माण पद्धति से बना हुआ है। इसी किले में 10 जनवरी, 1616 को जहाँगीर तथा सर टॉमस रो की मुलाकात हुई थी, जिसमें उन्हें भारत में व्यापार करने की अनुमति दी गई थी। वर्तमान में यह दुर्ग राजकीय संग्रहालय में बदल दिया गया है।
  8. टॉडगढ़ का किला (टॉडगढ़, अजमेर)।
  9. लोहागढ़ दुर्ग/मिट्टी का किला (भरतपुर): इस दुर्ग का निर्माण जाटों के प्लूटो/अफलातून सूरजमल जाट द्वारा करवाया गया था। सूरजमल ने इस किले के चारों ओर दो दीवारंे बनाकर उसमें मिट्टी भरवा दी थी। इसी कारण यह लोहागढ़/मिट्टी का किला कहलाता है। सन् 1805 में अंग्रेज सेनापति लॉर्ड लेक का भरतपुर अभियान विफल रहा, इसलिये यह दुर्ग ‘अजेयदुर्ग‘ कहलाता है। इसके चारों ओर जलखाई (सुजानगंगा नगर) है, जिसमें अजान बाँध (मोती झील) से पानी लाया जाता था।
  10. डीग का किला (डीग, भरतपुर): इसके पास ही प्रसिद्ध जल महल है। जल महलो की नगरी के रूप में डीग प्रसिद्ध है।
  11. तिवनगढ़ / तमनगढ़ / त्रिभुवनगढ़ (बयाना, भरतपुर): इसका निर्माण त्रिभुवनपाल द्वारा करवाया गया था।
  12. विजयगढ़/बादशाह दुर्ग/विजय मन्दिर गढ़/बयाना का दुर्ग (बयाना, भरतपुर): इस दुर्ग का निर्माण विजयपाल द्वारा करवाया गया था। यह पहले बाणेश्वर दुर्ग के नाम से जाना जाता था। इस दुर्ग में लाल पत्थरों से निर्मित एक ऊँचा स्तम्भ/लाट है, जो भीमलाट के नाम से प्रसिद्ध है। इस दुर्ग में लोदी मीनार, ऊषा मन्दिर, समुद्रगुप्त का विजय स्तम्भ आदि स्थित है।
  13. माधोराजपुरा का किला (माधोराजपुरा, जयपुर)।
  14. चौमू का किला/चौमुँहागढ़/धाराधारगढ़  (चौमू, जयपुर): इस दुर्ग के संस्थापक कर्ण सिंह थे।
  15. आमेर दुर्ग/आम्बेर का दुर्ग (जयपुर): यह हिन्दु-मुगल शैली के समन्वित रूप वाला किला है। आमेर ही वह राज्य था, जिसने सर्वप्रथम मुगलों से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किये तथा सर्वप्रथम अकबर की अधीनता स्वीकार की थी। इस दुर्ग में शिलादेवी मन्दिर, जगत शिरोमणि मन्दिर (मीराबाई द्वारा पूजी जाने वाली भगवान श्रीकृष्ण की काले रंग की मूर्ति), सुहाग/सौभाग्य मन्दिर स्थित है। इस दुर्ग के प्रवेश द्वार को गणेशपोल कहा जाता है, जिसे फर्ग्यूसन ने विश्व का सर्वश्रेष्ठ प्रवेशद्वार कहा था।
  16. नाहरगढ़/सुदर्शनगढ़ (जयपुर): इस दुर्ग के संस्थापक सवाई जय सिंह थे तथा इसका पुनर्निर्माण सवाई राम सिंह द्वारा करवाया गया था। सवाई माधों सिंह ने अपनी 9 प्रेयसियों के नाम पर यहाँ एक जैसे 9 महल विक्टोरिया शैली में बनवाये थे। इसे महलों का दुर्ग भी कहा जाता है। गैटोर की छतरियाँ इस किले के पास ही स्थित हैं।
  17. जयगढ़ दुर्ग/चिल्ह का टोला (जयपुर): इस दुर्ग के संस्थापक मिर्जा राजा जय सिंह तथा सवाई जय सिंह द्वितीय थे। यहाँ एशिया का तोप ढ़ालने का एकमात्र कारखाना था। सवाई जय सिंह द्वारा निर्मित एशिया की सबसे बड़ी तोप जयबाण यहाँ पर स्थित है। इस किले में विजयगढ़ी नामक एक लघु अंतःदुर्ग स्थित है। आपातकाल (श्रीमती इन्दिरा गाँधी के समय) में यहाँ कछवाहा वंश (राजा मान सिंह) के गुप्त खजाने की खोज हेतु व्यापक खुदाई हुई थी।
  18. दूदू का दुर्ग (जयपुर)।

 

राजस्थान के चित्रकला संग्रहालय चित्रकला के विकास हेतु कार्यरत संस्थाएँ
1 चित्रशाला बूँदी 1 धोराँ जोधपुर
2 पोथीखाना जयपुर 2 चितेरा जोधपुर
3 जैन भंडार जैसलमेर 3 टखमण-28 उदयपुर
4 पुस्तक प्रकाश जोधपुर 4 तूलिका कलाकार 

परिषद्

उदयपुर
5 सरस्वती भंडार उदयपुर 5 पैग जयपुर
6 अलवर संग्रहालय अलवर 6 आयाम जयपुर
7 माधोसिंह 

संग्रहालय

कोटा 7 कलावृत जयपुर
8 क्रिएटिव 

आर्टिस्ट ग्रुप

जयपुर 8

 

राजस्थानी लोक चित्रकला

  • राजस्थानी चित्रकला के मुख्यतया दो स्वरूप मिलते है –
  1. लोक कलात्मक और   2. दरबारी
  • लोक कलात्मक स्वरूप अधिकतर धर्मपीठों एवं जन समाज में प्रचलित रहा।
  • दरबारी स्वरूप सामंती परिवेश में प्रचलित रहा।

राजस्थानी लोक चित्रकला को सुविधा के लिए निम्नांकित भागों में बाँटा जा सकता है –

  1. भित्ति एवं भूमि चित्र –

(अ) आकारद चित्र – भित्ति, देवरा, पथवारी आदि पर

(ब)  अमूर्त, सांकेतिक, ज्यामितीय, सांझी एवं माण्डणा आदि।

  1. कपड़े पर निर्मित चित्र – पट-चित्र, पिछवाई, फड+ आदि।
  2. कागज पर निर्मित चित्र – पाने।
  3. लकड़ी पर निर्मित चित्र – कावड़, खिलौने आदि।
  4. पक्की मिट्टी पर निर्मित चित्र – मृद्पात्र, लोकदेवता, देवियाँ एवं खिलौने आदि
  5. मानव शरीर पर चित्र – गोदना या गुदना, मेंहदी आदि।

भित्ति एवं भूमि चित्र

(अ) आकारद चित्र – भित्ति चित्र, देवरा, पथवारी।

  • भित्ति चित्रण आदिकाल से प्रचिलत रहा है।
  • भरतपुर के दर, कोटा के आलणियाँ और चम्बल के शैलाश्रयों के रेखाकंन में आदि मानव की भूमिका है।
  • सवाई माधोपुर के मीणा जाति के गाँवों जैसे- जोनपुर, कुशलता, बेगमपुरा, एकड़ा गंभीरा, मुई आदि में और बाँसवाड़ा, डूंगरपुर आबू पर्वत के कांठे में भील, गरासियाँ, सहरिया, बागरया आदि आदिवासियों में लोककला के आकारद चित्र बनते है।
  • मीणा जाति में मोरड़ी मांडना उनकी परम्परा का अंग है क्योंकि इस जाति का राष्ट्रीय पक्षी मोर से अधिक लगाव रहा है। 
  • भील जाति अपनी लोकदेवी भराड़ी का बड़ा ही आकर्षक और मांगलिक चित्र भील युवती के विवाह पर घर की भीत (दीवार) पर बनाया जाता है। इसे भराड़ी मांडना कहते है। 
  • पथवारी – 
  • पथवारी पथ की रक्षक है तथा तीर्थ यात्रा पर जाते समय पथवारी की पूजा की जाती है। 
  • 5 फीट लम्बे और तीन फूट चौड़े चौरे के चारों ओर चित्र बनते है। एक और काला-गोरा भेरूजी तथा दूसरी ओर कावडिय़ा वीर (श्रवण कुमार) के चित्रण के साथ एक ओर गंगाधर तथा घर के दोनों ओर दो आंखे इन्हें सजीवता प्रदान करती है। 

 

देवरा – 

  • देवरा खुले चबूतरे पर बना एक त्रिकोणात्मक आकार का होता है। जो कि अधिकतर सड़क के मोड़ पर सूर्य के प्रकाश में नहाता रहता है। उदाहरण – रामदेवजी का देवरा, धोबियों का देवरा, तेलियो का देवरा, कुम्भकारों का देवरा, भेरूजी का देवरा, और तेजाजी का देवरा आदि। 
  • अमूर्त, सांकेतिक व ज्यामितीय अलंकरण –

 

सांझी – 

  • सांझी पूजन की परम्परा भारत में राजस्थान, उत्तरप्रदेश, पंजाब, तथा दिल्ली के आस-पास वर्तमान में भी है। 
  • सांझी दशहरे से पूर्व नवरात्रा में बनाई जाती है। 
  • सांझी में कुंवारी लड़कियाँ सफेदी से पूती दीवारों पर लगातार 15 दिन तक गोबर से आकार उकेरती है व उसका पूजन करती है। 
  • राजस्थान में सांझी संंझुली, सांझुली, सिंझी, सांझ के हाँजी, और हाँज्या आदि कई नामों से प्रचलित है।
  • उदयपुर में स्थित मछन्दरनाथ मंदिर सांझियों के लिए प्रसिद्ध है जिसे संझया मन्दिर भी कहते है। 

 

मांडणा – 

  • मांडणा का शाब्दिक अर्थ 1ड्ड4स्रक्वह्म् करना है।
  • माण्डणे घर की देहरी, चौखट, आंगण, चबूतरा, चौक, घड़ा रखने की जगह, पूजा स्थल आदि पर भितियों और दीवारों को अलंकृत करने के लिए बनाये जाते है।
  • राजस्थान के मांडणे अत्यन्त सरल होते हुए भी अमूर्त एवं ज्यामितीय शैली का अद्भूत सम्मिश्रण है। 
  • पगल्या, स्वास्तिक या सातिये, गलीचा, ताम, चौकड़ी आदि मांडणो के प्रकार है। 
  • मांडणे स्त्री के जीवन, उसके सदय में छीपी भावनाओ, भय व आकांक्षाओं को भी दर्शाते हैं। 

 

कपड़े पर निर्मित चित्र –

  • सम्पूर्ण राजस्थान में भीलवाडा के शाहपुरा कस्बे में लगभग 500 वर्ष पुरातन पट-चित्रण (कपड़ेे पर निर्मित चित्र)परम्परा जीवित है। 
  • छीपा जाति के जोशी या ज्योतिषी चितेरे आज भी पट-चित्रण में व्यस्त है। 
  • शाहपुरा का जोशी परिवार अपनी पट चित्रण कला के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है। 
  • लोक देवी-देवताओं एवं लोक नायकों के चरित्रों का कपड़े पर चित्रों के माध्यम से चित्रांकन करना फड़ कहलाता है। 
  • फड़ भोपो (चारण, गुर्जर एवं भाट) के लिए बनाई जाती है जो उनके जीविकोपार्जन का माध्यम है। 
  • भोपे गाँव-गाँव जाकर पारम्परिक वस्त्र पहनकर रावण हत्था या जन्तर वाद्य यंत्र की धुन के साथ कदम थिरकाते हुए फड़ का वाचन करते है। 
  • भीलवाड़ा निवासी श्रीलाल जोशी फड़ शैली के अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त चित्रकार है। 
  • फड़ की लम्बाई लगभग 24 फीट और चौड़ाई लगभग 5 फीट रहती है। (24 फीट  5 फीट)
  • पाबूजी की फड़, देवनारायणजी की फड़, माताजी की फड़ आदि प्रमुख फड़ चित्रण शैली के उदाहरण है। 
  • रामजी या रामदला की फड़का सर्वप्रथम चित्रांकन शाहपुरा (भीलवाड़ा) के धूलजी चितेरे ने किया था। 
  • कन्हैयालाल जोशी की पत्नि श्रीमति पार्वती जोशी राजस्थान की     
  • प्रथम क्तड़ चितेरा महिला है।
  • वार्तिक कपड़े पर मोम चित्र बनाने की कला है।  

 

लकड़ी पर निर्मित चित्र – कावड़ एवं खिलौने –

  • राजस्थान में खाती, सुथार एवं खेरादी जाति के लकड़ी के कारीगर बसे हुए है। 
  • बस्सी (चित्तौडग़ढ़) काष्ठ की कलात्मक वस्तुओं के लिए प्रसिद्ध है। 
  • मोर चौपड़ा, (श्रृंगारदान), चौकी, (बाजोट), गणगौर, हिंडोला, विमान, कावड़ एवं लोकनाट्यों में काम आने वाली विभिन्न वस्तुएँ जैसे खाण्डा, तलवार, मुखौटे, पुतलियाँ आदि बनते है। 

 

कावड़ –

  • कावड़ मंदिरनुमा काष्ठ कलाकृति होती है जिसमें कई द्वार बने होते है। सभी द्वारों या कपाटो पर चित्र अंकित होते है। 
  • कथा वद्मचन के साथ-साथ प्रत्येक कपाट या दरवाजा भी खुलता जाता है। सभी कपाट खुल जाने पर अन्त में श्रीराम, लक्ष्मण और सीता की मूर्तिया दिखाई देती है जिसकी पूजा की जाती है। 
  • कावड़ पूरी लाल रंग से रंगी जाती है और उसके ऊपर काले रंग से पैराणिक कथाओं को चित्रित किया जाता है। 

 

पक्की मिट्टी पर चित्र –

  • पक्की मिट्टी के बर्तनों पर चित्रण की परम्परा प्रागैतिहासिक काल से चली आई है। 
  • राजसंमद के मोलेला गाँव में कुम्भकारों द्वारा पूजा एवं सज्जा हेतु कलात्मक मूण्द्र्मंमूर्तियाँ बनाई जाती है और उन पर चित्रकारी भी की जाती है। 
  • मोलेला में खिलौनों पर चित्रकारी करने का कार्य भी बहुलता से होता है।

 

फड़ फड़ वाचक वाद्ययंत्र विशिष्ट तथ्य
देवनारायण जी की फड़ गूजर भोपे जंतर यह सबसे पुरानी, सर्वाधिक चित्रांकन व सर्वाधिक लंबी फड़ है। इसके चित्रांकन में सर्प का चित्र तथा इनकी घोड़ी को हरे रंग से चित्रित किया जाता है। इनकी फड़ पर डाक विभाग द्वारा 2 सितम्बर, 1992 में डाक चित्र जारी किया गया था। इनकी एक फड़ पश्चिमी जर्मनी के कला संग्रहालय में विद्यमान है।
पाबूजी की फड़ आयड़ी/ नायक थोरी, भोपे रावण हत्था इस फड़ में पाबूजी के मुख के सामने भाले का चित्र होता है तथा पाबूजी की घोड़ी केसर कालमी को काले रंग से चित्रित किया जाता है। इसको रात्रि में बाँचा जाता है। यह सबसे लोकप्रिय फड़ हैं।

 

रामदेवजी की फड़ कामड़ जाति के भोपे रावण हत्था चौथमल चितेरे द्वारा चित्रित इस फड़ का प्रचलन ढाढ़ी, कोली, चमार तथा बलाइयों आदि में अधिक है, जो कि रामदेवजी के भक्त हैं।
रामदला-  कृष्णदला की फड़ भाट जाति के भोपे बिना किसी वाद्य के इनमें भगवान श्रीराम अथवा श्रीकृष्ण के जीवन की प्रमुख घटनाओं का चित्रण किया जाता है। इनका वाचन हाड़ोती क्षेत्र में दिन में किया जाता है।
गोगाजी की फड़ भोपे डेरू भैंसासुर की फड़ वाचन नहीं बिना किसी वाद्य के चोरी के लिये जाते समय बावरी (बागरी) जाति के लोग इसकी पूजा करते हैं।
भैंसासुर की फड़ वाचन नहीं बिना किसी वाद्य के चोरी के लिये जाते समय बावरी (बागरी) जाति के लोग इसकी पूजा करते हैं।

राजस्थान के ऐतिहासिक स्रोत

राजस्थान के ऐतिहासिक स्रोत

Geetanjali Academy- By Jagdish Takhar

 

 

राजस्थान का इतिहास

चौहान वंश का इतिहास (शाकम्भरी एवं अजमेर के चौहान)-

  • चौहानों का मूल स्थान जांगलदेश में सांभर के आसपास सपादलक्ष क्षेत्र को माना जाता है। इनकी प्रारंभिक राजधानी अहिछत्रपुर (नागौर) थी। बिजौलिया शिलालेख के अनुसार सपादलक्ष के चौहान वंश का संस्थापक वासुदेव चौहान नामक व्यक्ति था जिसने 551 ई0 के आसपास इस वंश का शासन प्रारंभ किया। बिलौलिया शिलालेख के अनुसार सांभर झील का निर्माण भी इसी ने करवाया था। इसी के वंशज अजयपाल ने अजयमेरू दुर्ग का निर्माण करवाया था। 

 

अजयराज –

  • यह महान् शासक जिसने 1113 ई0 के लगभग अजयमेरू (अजमेर) बसाकर उसे अपनी राज्य की राजधानी बनाया उसने श्री अजयदेव नाम से चाँदी के सिक्के चलाए। 

 

अर्णोराज-

  • अजयराज के बाद अर्णोराज ने 1133 ई0 के लगभग अजयमेरू (अजमेर) का शासन संभाला, अर्णोराज ने तुर्क आक्रमणकारियों को बुरी तरह हराकर अजमेर में आनासागर झील का निर्माण करवाया, अर्णोराज ने पुष्कर में वराह-मंदिर का निर्माण करवाया था। 

 

विग्रहराज-चतुर्थ (बीसलदेव)-

  • 1158 ई0 के आसपास अजमेर की गद्दी पर बैठा, राज्य की सीमा का अत्यधिक विस्तार किया। दिल्ली के तोमर शासक को पराजित किया व दिल्ली को अपनी राजधानी बनाया। विग्रहराज विद्वानों का आश्रयदाता होने के कारण कविबांधव से जाना जाता है। विग्रहराज ने स्वयं ने हरिकेलि नाटक की रचना की। अजमेर में संस्कृत पाठशाला का निर्माण करवाया। जिसे बाद में ऐबक (1206-10) ने तुड़वा दिया व मस्जिद (ढ़ाई दिन का झोपड़ा) बनवा दी। विग्रहराज ने अजमेर में बीसलसागर बाँध का निर्माण भी करवाया। इसके काल को चौहान शासन का र्स्वणयुग भी कहा जाता है। 

 

पृथ्वीराज तृतीय-

  • अजमेर के चौहान वंश का अंतिम प्रतापी शासक पृथ्वीराज तृतीय था जिसने 1177 में पिता सोमेश्वर की मृत्यु के उपरांत 11 वर्ष की आयु में अजमेर का सिंहासन प्राप्त किया, इसकी माता कपूरीदेवी ने प्रारंभ में बड़ी कुशलता से राज्य को संभाला।

 

युद्ध

  • तराईन का प्रथम युद्ध 1191 पृथ्वीराज-गौरी के मध्यः पृथ्वीराज विजयी हुआ। 
  • तराईन का द्वितीय युद्ध 1192 पृथ्वीराज-गौरी के मध्यः गौरी विजयी हुआ। 

 

विद्वान 

  • पृथ्वीराज स्वयं बहुत बड़ा विद्वान था। विद्वानों का संरक्षक था उसके दरबार में चन्दबरदाई (पृथ्वीराज रासो) जयानक, जर्नादन व नागीश्वर आदि विद्वानों को आश्रय प्राप्त था। 

 

रणथम्भौर के चौहान

  • तराईन के द्वितीय युद्ध के बाद पृथ्वीराज के पुत्र गोविन्दराज ने कुछ समय बाद रणथंभौर में अपना शासन स्थापित किया। 
  • रणथंभौर वंश का अंतिम प्रतापी शासक हम्मीर देव था। इसी समय दिल्ली सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने 1301 में आक्रमण करके रणथंभौर को जीत लिया। 

 

जालौर के चौहान

  • जालौर का प्राचीन नाम जाबालीपुर था। संस्थापक कीर्तिपाल चौहान था। 
  • 1309 में अलाउद्दीन खिलजी ने यहां आक्रमण किया इस समय यहां का शासक कान्हड़देव था। 
  • किले के भीतर अलाउद्दीन ने अलाउद्दीन मस्जिद बनवाई। 
  • युद्ध की जानकारी पद्मनाथ के कान्हड़देव प्रबंध से मिलती है। 

 

सिरोही के चौहान

  • सिरोही में चौहानों की देवड़ा शाखा का शासन था। 
  • जिसकी स्थापना 1131 में लुंबा द्वारा की गई थी व राजधानी चन्द्रावती को बनाया। 
  • सिरोही नगर की स्थापना 1425 ई0 में सहसामल नामक राजा ने की। 
  • 1823 ई0 में यहां के शासक शिवसिंह में ई0आई0सी0 (ईस्ट इंडिया कम्पनी) की अधीनता स्वीकार कर ली थी। 

 

हाड़ौती के चौहान

बूँदी राज्य का इतिहास 

  • 1342 में देवा ने बूँदी में हाड़ा चौहान वंश का शासन स्थापित किया। 
  • बूँदी  का नाम बूँदी मीणा के नाम पर पड़ा। 
  • हाड़ौती में वर्तमान में कोटा, बूँदी व बारां क्षेत्र आते है। 
  • 1631 में मुगल बादशाह शाहजहाँ ने कोटा को बूँदी से स्वतंत्र करके बूँदी के शासक रतनसिंह के पुत्र माधोसिंह को दे दिया। 
  • 1818 ई0 में बूँदी के शासक विष्णुसिंह ने ई0आई0सी0 की अधीनता स्वीकार कर ली। 

 

कोटा राज्य का इतिहास 

  • कोटा प्रारंभ में बूँदी रियायत का ही एक भाग था यहां हाड़ा चौहानों का शासन था। 
  • शाहजहाँ के समय बूँदी नरेश रतनसिंह के पुत्र माधोसिंह को कोटा का पृथक राज्य देकर उसे बूँदी से स्वतंत्र कर दिया तभी से कोटा स्वतंत्रता राज्य के रूप में स्वतंत्र है। 
  • कोटा पूर्व में कोटिया भील के नियंत्रण में था जिसे बूँदी के चौहान वंश के संस्थापक देवा के पौत्र जैत्रसिंह ने मारकर अपने अधिकार में कर लिया कोटिया भील के नाम से इसका नाम कोटा पड़ा। 
  • दिसम्बर 1817 में यहाँ के शासक जालिमसिंह झाला ने ई0आई0सी0 से संधि कर ली। 

 

मेवाड़ राज्य का इतिहास 

  • उदयपुर (मेवाड़) का प्राचीन नाम शिवि, प्राग्वाट, मेदपाट आदि रहे है। इस क्षेत्र पर पहले मेद अर्थात् मेव या मेर जाति का अधिकार रहने से इसका नाम मेदपाट (मेवाड़) पड़ा। 
  • मेवाड़ इतिहास की जानकारी गुहिल (गुहादित्य) के काल से प्रारंभ होती है। गुहादित्य (गुहिल) ने 566 ई0 के आसपास मेवाड़ में गुहिल वंश की नीव डाली। इसके पिता का नाम शिलादित्य व माता का नाम पुष्पावती था। 

 

बप्पा रावल  (734-753)-

  • यह मेवाड़ राज्य का प्रतापी शासक था। इसे मेवाड़ राज्य का वास्तविक संस्थापक भी कहा जाता है। 
  • इसका मूल नाम कालभोज था 
  • 734 में बप्पा ने मौर्य राजा मान से चित्तौड़ को जीता। 

 

जैत्रसिंह- (1213-1253)

  • जैत्रसिंह के समय इल्तुतमिश ने मेवाड़ की राजधानी नागदा पर आक्रमण करके क्षति पहुँचाई तब जैत्रसिंह ने मेवाड़ की राजधानी चित्तौड़ को बनाया। 

 

रतनसिंह-

  • 1303 में अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया। 
  • इस आक्रमण के समय अमीर खुसरों अलाउद्दीन खिलजी के साथ था। 
  • रतनसिंह को अलाउद्दीन ने धोखे से कैद कर लिया बाद में गोरा व बादल ने अलाउद्दीन पर भयंकर आक्रमण किया। 
  • रानी पद्मावती ने अन्य स्त्रियों के साथ जौहर किया। 
  • अलाउद्दीन ने चित्तौड़ अपने पुत्र खिज्रखां को सौंप दिया और उसका नाम बदलकर खिज्राबाद कर दिया। 
  • अलाउद्दीन की मृत्यु के उपरांत राणा हम्मीर ने पुनः चित्तौड़ को जीतकर सिसोदिया वंश की पुनः स्थापना की। 
  • 1382 में लक्षसिंह (लाखा) मेवाड की गद्दी पर बैठा उसके समय में एक बंजारे ने पिछोला झील का निर्माण करवाया। 

 

महाराणा कुंभा 1433-68 –

  • कुम्भा को हिंदू सुरताण व अभिनव भरताचार्य भी कहा जाता है। 
  • पिता का नाम मोकल व माता का नाम सौभाग्यदेवी था। 
  • कुम्भा ने सांरगपुर के युद्ध में मालवा के शासक महमूद खिलजी को पराजित किया। 
  • विजय स्मृति हेतु चित्तौड़ किले के भीतर विजय स्तम्भ का निर्माण करवाया (1440-48) इसकी ऊँचाई 120 फीट है व 9 मंजिला है। 
  • इसे भारतीय मूर्तिकला का विश्व कोष भी कहा जाता है। 
  • वास्तुकार जेता व उसके दो पुत्र नापा व पूंजा थे। 
  • विजय स्तंभ प्रशस्ति के रचयिता कवि अत्रि थे। 
  • कुम्भा ने दो विजय स्तम्भ बनवाए एक चित्तौडगढ़ के दुर्ग भीतर व दूसरा कुम्भलगढ़ दुर्ग के अंदर। 
  • कुम्भा ने कुंभश्याम मंदिर, आदिवराह मंदिर, श्रृंगार  गौर मंदिर, मीरा मंदिर, कुंभलगढ़ दुर्ग के भीतर कुंभस्वामी का मंदिर बनवाया। 
  • मेवाड़ में 84 दुर्ग हैं इनमें 32 दुर्गों का निर्माण कंुभा ने करवाया था। 
  • कुंभा के समय रणकपुर जैन मंदिर का निर्माण 1439 ई0 में जैन व्यापारी धरनक शाह ने करवाया था। 

 

महाराणा कुंभा के राज्याश्रित विद्वान व कलाकार-

  • कुम्भा एक कवि, नाटककार, टीकाकार, संगीताचार्य था उसने संगीतराज, संगीत मीमांसा, रसिकप्रिया व सुधा प्रबंध, कामराज इतिसार नामक ग्रंथो की रचना की। 
  • सारंग व्यास – ये संगीताचार्य थे कुंभा के संगीत गुरू। 
  • कान्ह व्यास-दरबारी कवि एकलिंग महात्म्य के रचनाकार।
  • रमाबाई – कुम्भा की पुत्री (संगीतशास्त्र की ज्ञाता)।
  • अत्रि-संस्कृत के महान् कवि कीर्तिस्तम्भ प्रशस्ति की रचना प्रारंभ की जिसे उनकी मृत्यु उपरांत उनके पुत्र महेश भट्ट ने पूर्ण किया। 
  • मंडन-शिल्पशास्त्र के ज्ञाता अनेक ग्रन्थ लिखे जो क्रमशः प्रासाद मंडन, राजवल्ल्भमंडन, रूप मंडन, देवमूर्ति प्रकरण वास्तु मंडन, वैद्य मंडन आदि। 
  • कुम्भा की हत्या पुत्र उदयकरण (उदा) द्वारा 1468 ई0 में की गई। 

 

संग्राम सिंह (महाराणा सांगा 1509-27)-

  • खातोली का युद्ध-1517 में सांगा व दिल्ली सुल्तान इब्राहिम लोदी के मध्य सांगा की विजय हुई। 
  • गागरोन का युद्ध- 1518 में राणा ने मालवा शासक महमूद खिलजी द्वितीय व गुजरात शासक मुजफ्फर शाह द्वितीय को पराजित किया। 
  • बयाना युद्ध-फरवरी, 1527 में सांगा ने बाबर की सेना को पराजित कर बयाना का किला जीता। 
  • खानवा युद्ध – मार्च, 1527 बाबर ने सांगा को पराजित किया। 
  • सांगा की मृत्यु 1528 में दौसा जिले की बसवा तहसील में हुई। 
  • सांगा की मृत्यु के उपरांत विक्रमादित्य शासक बना (नाबालिक) संरक्षिक सांगा की पत्नी कर्णवती बनी। 1533 में गुजरात के शासक बहादुरशाह ने मेवाड़ पर आक्रमण किया सहायता हेतु कर्णवती ने हुमायूं के पास राखी भेजी हुमायूं ने कोई सहायता नहीं की व बहादुरशाह का मेवाड़ पर कब्जा हो गया। 

 

उदयसिंह (1537-72)

  • उदयसिंह के समय अकबर ने 1567 पर चित्तौड़ में आक्रमण किया व उसे जीत लिया। 
  • उदयसिंह के दो सेनापति जयमल व फत्ता (फतहसिंह) ने अकबर का बहादुरी से मुकाबला किया किंतु वीरगति को प्राप्त हुए। 
  • उदयसिंह ने गोगुन्दा को अपनी नई राजधानी बनाया व उदयपुर शहर बसाया। 

 

महाराणा प्रताप (1572-97)

  • 1572 में राणाप्रताप मेवाड़ के राज्यसिंहासन पर बैठा जिसका नाम न केवल राजस्थान के इतिहास में अपितु विश्व इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिया गया है। 
  • 1576 में प्रताप व अकबर के सेनापति मानसिंह के
  • मध्य हल्दीघाटी का युद्ध हुआ जिसमें राणा पराजित हुआ।
  • इस युद्ध में अफगान सेनापति हकीम खाँ सूर राणा की तरफ से लड़ा।
  • भामा शाह ने राणा को आर्थिक सहायता पहुँचाई। 
  • हल्दीघाटी को मेवाड़ की थर्मोपोली भी कहा जाता है। 

 

अमरसिंह (1597-1620)

  • मुगल मेवाड़ संधि 1615 में मेवाड़ शासक अमरसिंह ने मुगल शासक जहाँगीर की अधीनता स्वीकार कर ली। 
  • चित्रकला का सर्वाधिक विकास अमरसिंह के समय में ही हुआ था। 

 

जगतसिंह प्रथम

  • पिछोला झील में जैनमंदिर महल बनवाया। जगतसिंह के समय में ही प्रतापगढ़ की जागीर
  •  मुगल बादशाह शाहजहाँ ने मेवाड़ से स्वतंत्र कर दी। 

 

राजसिंह 1652-80-

  • जोधपुर के शासक अजीतसिंह को संरक्षण दिया। 
  • राजसमंद जिलें में (कांकरोली) द्वाराकाधीश मंदिर बनवाया। 
  • उदयपुर में अम्बामाता मंदिर बनवाया। 
  • राजसमंद झील का निर्माण करवाया। 

 

जयसिंह 1680-98

  • गोमती नदी पर जयसमंद झील का निर्माण करवाया जिसे ढ़ेबर झील भी कहा जाता है। 

 

संग्राम सिंह 1710-1734-

  • सहेलियों की बाड़ी बनवाई। 
  • 1734 में हुरड़ा सम्मेलन की अध्यक्षता की। 

 

भीमसिंह-कृष्णकुमारी विवाह

  • 1818 में भीमसिंह ने ई0आई0सी0 की अधीनता स्वीकार कर ली। 

 

मारवाड़ का इतिहास – मारवाड़ अंचल में जोधपुर, बीकानेर, बाड़मेर, जालौर, नागौर व पाली जिलें आते हैं।

  • मारवाड़ के राठौड़ वंश की स्थापना राव सीहा ने 13वीं शताब्दी में किया। 
  • राव चूडा ने मंडौर को मारवाड़ की राजधानी बनाया व साम्राज्य का विस्तार किया। 

 

राव जोधा-

  • जोधपुर शहर 1459 ई0 में बसाया व मंडौर की जगह जोधपुर को नई राजधानी बनाया। 
  • चिड़ियाटूक पहाड़ी पर मेहरानगढ़ का दुर्ग बनवाया। 

 

राव मालदेव-(1531-62) – मारवाड़ का सबसे प्रतापी व योग्य शासक था।

  • विवाह जैसलमेर की राजकुमारी उम्मादे के साथ हुआ जो इतिहास में रूठी रानी के नाम से प्रसिद्ध है। 
  • सुमेल युद्ध – यह युद्ध 1544 ई0 में मारवाड़ के शासक मालदेव व दिल्ली के सुल्तान शेरशाह सूरी के मध्य लड़ा गया था जिसमें शेरशाह की विजय हुई। 
  • मालदेव ने पोकरण का किला, मालकोट किला (मेड़ता) व सोजत का किला बनवाया था। 

 

चन्द्रसेन 1562-81-

  • मारवाड़ का प्रताप भी कहा जाता है मोटा राजा उदयसिंह (1583-95) अकबर की अधीनता स्वीकार करके अपनी पुत्री जगतगोसाई का विवाह जहाँगीर से किया जिससे खुरर्म (शाहजहाँ) उत्पन्न हुआ। 

 

जसवंत सिंह प्रथम (1638-78) –

  • दुर्गादास इनका सेनापति था जिसने अजीत सिंह को मारवाड़ की गद्दी पर बैठाने हेतु 30 साल युद्ध लड़ा। 
  • अजीतसिंह ने अपनी पुत्री इन्द्रकुमारी का विवाह फर्रूखशियर से किया। 

 

मानसिंह (1803-43) – ने नाथ संप्रदाय के महामंदिर का निर्माण करवाया था। 

आमेर के कछवाहों का इतिहास-

  • कछवाहा राजपूत अपने को भगवान रामचंद्र के वंशज बताते थे। 
  • नरवर (मध्यप्रदेश) के शासक दुल्हैराय ने 1137 में कछवाहा वंश की स्थापना की व रामगढ़ में अपनी कुलदेवी जमुवा माता का मंदिर बनवाया। 
  • पुत्र कोकिल देव ने 1207 में आमेर को राजधानी बनाई। 

 

राजा भारमल (1547-73)-

  • 1562 में अकबर की अधीनता स्वीकार करने वाला राजस्थान का पहला राज्य था, पुत्री हरखा बाई का विवाह अकबर से किया। 

 

भगवानदास (1573-89)

  • अपनी पुत्री मानबाई का विवाह सलीम (जहाँगीर) से किया जिससे खुसरों का जन्म हुआ। 

 

मानसिंह प्रथम (1589-1614)-

  • मथुरा में राधा गोविन्द का मंदिर बनवाया। 
  • मानसिंह के भाई माधोसिंह के संरक्षण में पुण्डरीक विट्ठल ने रागचन्द्रोदय, राग कल्पदु्रम नर्तन निर्णय ग्रन्थ लिखे। 

 

मिर्जा राजा जयसिंह (1621-67) -जहाँगीर, शाहजहाँ व औरंगजेब का समकालीन मिर्जा की उपाधि शाहजहाँ ने दी।

  • पुरंदर की संधि 1765 मिर्जा राजा जयसिंह और शिवाजी के मध्य।
  • दरबारी कवि बिहारी (बिहारी सतसई लिखी)।

 

सवाई जयसिंह (द्वितीय) (1700-43)- सवाई की उपाधि औरंगजेब द्वारा दी गई।

  • हुरड़ा सम्मेलन (1734) बुलाया। 
  • 1727 में जयनगर (जयपुर) बसाया (वास्तुविद् पं0 विद्याधर भट्टाचार्य) जयगढ़ व नाहरगढ़ का किला बनवाया। 
  • जयपुर, दिल्ली, उज्जैन, बनारस व मथुरा में वेधशालाएँ बनवाई।
  • नक्षत्रों की सारणी जीज मुहम्मद शाही बनवाई। 
  • जयसिंह कारिका नामक ज्योतिष ग्रंथ की रचना की। 
  • जयपुर के चन्द्रमहल (सिटी पैलेस) व जलमहल का निर्माण करवाया। 
  • जयसिंह अंतिम हिंदू नरेश जिसने अश्वमेघ (1740) यज्ञ करवाया जिसका प्रधान पुरोहित पुण्डरीक रत्नाकार था। 
  • सवाई जयसिंह की सबसे बड़ी भूल यह रही कि उसने बूँदी के उत्तराधिकार के झगड़े में पड़कर मराठों को आमंत्रित किया। 

 

सवाई ईश्वरी सिंह (1748-50)-

  • 1747 में राजमहल युद्ध (टोंक) में इसने माधोसिंह, मराठे व कोटा, बूँदी की संयुक्त सेना को पराजित किया। 
  • विजय के उपलक्ष्य में ईसरलाट (सरगासूली) का निर्माण करवाया। 
  • 1750 में मल्हार राव होल्कर ने जयपुर पर आक्रमण किया परेशान होकर ईश्वरी सिंह ने आत्महत्या कर ली। 

 

माधोसिंह प्रथम (1750-68)-

  • मराठा सैनिकों का जयपुर में कत्लेआम किया। 
  • 1763 में सवाई माधोपुर नगर बसाया। 
  • जयपुर में मोती डूँगरी महलों का निर्माण करवाया। 

 

सवाई प्रतापसिंह (1778-1803)-

  • ब्रजनिधि नाम से काव्य रचना करते थें 
  • जयपुर में संगीत सम्मेलन करवाकर राधागोविन्द संगीत सार ग्रन्थ की रचना करवाई। 
  • 1799 में हवामहल बनवाया। 

 

रामसिंह द्वितीय (1835-80)-जयपुर को गुलाबी रंग से रंगवाया। 

  • मेजर जॉन लुडली ने 1843 में सती प्रथा, दास प्रथा व कन्या वध, दहेज प्रथा पर रोक लगाई। 
  • 1857 में अंग्रेजों का वफादारी से साथ दिया फलस्वरूप अंग्रेजों ने सितार-ए-हिन्द की उपाधि प्रदान की। 
  • 1876 में प्रिंस ऑफ वेल्स ने जयपुर की यात्रा की उनकी यात्रा की स्मृति में अल्बर्ट हॉल (म्यूजियम) बनवाया व शिलान्यास पिं्रस अल्बर्ट के हाथों से करवाया। 
  • 1845 ई0 में महाराजा कॉलेज व संस्कृत कॉलेज बनवाया।  
  • विनयसिंह ने लाल किला व सिलिसेट झील बनवाई। 
  • 1803 ई0 में राव बख्तावर सिंह ने ई0आई0सी0 की अधीनता स्वीकार की। 

 

भरतपुर का जाट वंश – चूड़ामन ने भरतपुर राज्य की स्थापना की। 

  • बदनसिंह ने 1725 में डीग के महलों का निर्माण करवाया। 
  • सूरजमल ने लोहागढ़ का किला बनवाया। 
  • 1803 में रणजीत सिंह ने ई0आई0सी0 से संधि कर ली। 

 

जैसलमेर का भाटी वंश– चन्द्रवंशी यादव व श्रीकृष्ण के वंशज मानते है। शासक भट्टी ने 285 ई0 में भटनेर (हनुमानगढ़) स्थापना की। 

    • इसके वंशज भाटी कहलाए। इसी वंश के शासक जैसल ने 1155 ई0 में जैसलमेर स्थापना। 

 

  • राव जैसल ने सोनारगढ़ दुर्ग का निर्माण करवाया। 

 

  • मूलराज ने 1818 ई0 में ई0आई0सी0 की अधीनता स्वीकार कर ली। 

 

 

 

करौली का इतिहास-

  • करौली के यदुवंश की स्थापना विजयपाल यादव ने 1040 ई0 में की। 
  • शासक तिमनपाल ने तिमनगढ़ का दुर्ग बनवाया। 
  • 1817 में ई0आई0सी0 की अधीनता स्वीकार कर ली। 
  • 19 जुलाई, 1997 को करौली पृथक जिला (32वाँ) बना। 

 

महत्वपूर्ण तथ्य-

  • बीकानेर व जैसलमेर राज्य मराठा व पिंडारी आक्रमण से बचे रहे। 
  • 1817 में अंग्रेजों ने अमीर खाँ पिंडारी को टोंक का नवाब बनाया। 
  • 1817 से 1833 के मध्य राजस्थान के सभी शासकों ने ई0आई0सी0 संधि कर ली इस समय भारत का जी.जी. लार्ड हेस्टिग्स था उसने चार्ल्स मैटकॉफ को यह कार्य सौंपा। 
  • सबसे पहले 1817 में करौली ने एवं सबसे बाद में 1823 में सिरोही ने ई.आई.सी. से संधि की।
पत्र का नाम संस्थापक 
प्रताप  कानपुर से गणेश शंकर विद्यार्थी व विजय सिंह पथिक
राजस्थान समाचार अजमेर (1889) मुंशी समर्थदान(राज. का पहला हिंदी दैनिक पत्र)
राजस्थान केसरी वर्धा (1920) विजयसिंह पथिक, संपादक थे रामनारायण चौधरी वित्तीय सहायता जमनालाल बजाज से मिलती थी। 
नवीन राजस्थान (तरूण राजस्थान) अजमेर (1921) विजय सिंह पथिक
नवज्योति अजमेर (1936) रामनारायण चौधरी बाद में दुर्गाप्रसाद ने संभाला। 
प्रजासेवक जोधपुर, अचलेश्वर प्रसाद
राजपूताना गजट मौलवी मुराद अली, अजमेर से। 
अखंड भारत बंबई, जयनारायण व्यास।
अग्नीबाण ब्यावर, जयनारायण व्यास, राजस्थानी भाषा का प्रथम राजनैतिक पत्र।
राजस्थान  ब्यावर, ऋषिदंत मेहता।
जयभूमि जयपुर, गुलाबचंद काला।
राजस्थान टाइम्स जयपुर, वासुदेव काला।
लोकवाणी  जयपुर, देवीशंकर तिवारी (जमनालाल बजाज की स्मृति में)।
देश हितेषी अजमेर मुंशी मुन्नालाल
 स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान गठित संस्थाएँ–
सर्वहितकारिणी सभा 1907 बीकानेर, कन्हैयालाल ढूँढ़, स्वामी गोपालदास।
मारवाड़ सेवा संघ 1920, जोधपुर, चांदमल सुराना ।
मारवाड़ हितकारिणी सभा  मारवाड़ ।
हिंदी साहित्य समिति भरतपुर, महत्त जगन्नाथ दास।
नागरी प्रचारिणी सभा धौलपुर, ज्वालाप्रसाद जिज्ञासु व जौहरीलाल इंदु (इसने हिंदी के प्रचार प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका)।
राजस्थान सेवा संघ 1919 वर्धा, अर्जुनलाल सेठी, पथिक, केसरीसिंह बारहठ रामनारायण चौधरी, महात्मा गांधी के परामर्श से 1920 में अजमेर में स्थनांतरित।
वीर भारत समाज विजयसिंह पथिक ।
सम्प सभा स्वामी गोविंद गिरि।
वर्धमान विद्यालय अजमेर, अर्जुनलाल सेठी, बाद में जयपुर में स्थानांतरण
सर्व सेवा संघ सर्वोदयी श्री सिद्धराम डढ्ढ़ा।
बागड़ सेवा मंदिर डूँगरपुर, भांगीलाल पांड्या।
बांडलाई आश्रम सागवाड़ा, माणिक्यलाल वर्मा। 
राजस्थान दलित जाति संघ अमृतलाल यादव ।
हरिजन सेवक संघ रामनारायण चौधरी।

 

1857 की क्रांति एवं राजस्थान 

  • लॉर्ड डलहौजी (1848) की हड़पनीति (गोदनिषेध नीति) के कारण संपूर्ण भारत में अंग्रेजी के प्रति असंतोष बढ़ने लगा। इसके अलावा सेना में एनफील्ड राइफलों में सुअर व गाय की चर्बीं वाले कारतूसों के प्रयोग से सैनिकों ने विद्रोह कर दिया। 29 मार्च 1857 ई. में बैरकपुर छावनी (उत्तरप्रदेश) में मंगल पांडे ने एक अंग्रेज सैनिक अधिकारी को गोली मार दी। मंगल पा.डे को बाद में फाँसी दे दी गई। 10 मई 1857 को मेरठ छावनी में सैनिकों ने विद्रोह कर दिया। इस क्रांति को भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहा जाता है। 
  • इस समय भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड कैनिंग थे व राजस्थान के ए.जी.जी. जॉर्ज पैट्रिक लोरेन्स थे। मारवाड़ में मार्क मैसन, मेवाड़ में मेजर शाँवर्स, कोटा में मेजर बर्टन तथा जयपुर में कर्नल ईडन पॉलिटिकल एजेन्ट थे। अजमेर राजस्थान में ब्रिटिश सत्ता का प्रमुख केंद्र था। 
  • राजस्थान में अजमेर राजनीतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था। अजमेर में राजपूताना एजेन्सी थी जिसका मुख्य अधिकारी ए.जी.जी था। 1857 की क्रांति से पूर्व ही सारे राजस्थान में ब्रिटिश विरोधी वातावरण तैयार हो चुका था। जोधपुर का शासक महाराजा मानसिंह अंग्रेजों का प्रबल विरोधी बन गया उसने अंग्रेजों की मैत्री संधि को ठुकरा दिया था। इसने जसवंत राव होल्कर, अप्पा साहब भौंसले आदि की सहायता की। मानसिंह ने पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह से संपर्क स्थापित किया। मानसिंह अजमेर में आयोजित भव्य दरबार में भी नहीं गया, जिससे ब्रिटिश सरकार नाराज हो गई। जीवन भर ब्रिटिश विरोधी गतिविधियों में लगा रहा। तात्कालीन कवियों ने डूंगजी, जवाहर जी जैसे डाकुओं की प्रशंसा के काव्य लिखे जिन्होंने अंग्रेजी छावनी तथा सरकारी कोष को लूटा। 
  • 1857 के विद्रोह में अंग्रेजों की मदद करने में सबसे आगे बीकानेर का राजा सरदार सिंह था। ये राजस्थान के एक मात्र ऐसे शासक थे जो स्वयं अपनी सेना लेकर अंग्रेजों की सहायता के लिए राजपुताने से बाहर गए थे। 
  • 1857 के विद्रोह के समय राजस्थान में 6 सैनिक छावनियाँ थी इनमें सभी सैनिक भारतीय थे-
  1. नसीराबाद (अजमेर)     2. नीमच (मध्यप्रदेश)      3. देवली (टोंक)          
  2. एरनपुरा (जोधपुर वर्तमान-सिरोही)  5. ब्यावर (अजमेर) 6. खेरवाड़ा (उदयपुर)

 

  • ब्यावर (अजमेर) व खेरवाड़ा (उदयपुर) की छावनी के सैनिकों ने विद्रोह में भाग नहीं लिया। 

आऊवा की क्रांति-

  • एरनपुरा के सैनिक दिल्ली के रास्ते में आऊवा (पाली) नामक स्थान पर ठहरे। आऊवा के ठाकुर कुशाल सिंह चंपावत ने इन सैनिकों का नेतृत्व किया। 8 सितंबर 1857 ई. को कुशाल सिंह चंपावत ने जोधपुर के महाराजा तख्त सिंह तथा अंग्रेज कैप्टन हीथकोट की संयुक्त सेना को बिथौड़ा (पाली) नामक स्थान पर हराया। 18 सितंबर 1857 को जनरल पैट्रिक लोरेन्स व मार्क मैसन आऊवा पहुंचे जहां उनका ‘चेलावास‘ नामक स्थान पर कुशाल सिंह से युद्ध हुआ। कुशाल सिंह व इसकी सेना ने मार्क मैसन का सिर काटकर आऊवा के किले के दरवाजे पर टाँग दिया। इस युद्ध को ‘गोरो व कालो‘ का युद्ध कहा गया है।
  • 20 जनवरी 1858 को कर्नल होम्स की सेना ने कुशाल सिंह की सेना को हरा दिया तब कुशाल सिंह सलूंबर (उदयपुर) चले गए। 
  • अंग्रेज इस युद्ध के बाद सुगाली देवी (महाकाली) की मूर्ति को अजमेर ले गए जो आज भी राजकीय संग्रहालय, अजमेर में सुरक्षित है। 
  • कोटा में क्रांति-कोटा का पोलिटिकल एजेंट मेजर बर्टन था। 15 अक्टूबर 1857 को कोटा में विद्रोह हो गया यहां जयदयाल व मेहराब खां लोगों में क्रांति की भावना भर रहे थे। क्राांतिकारियों ने मेजर बर्टन, उसके दो पुत्रों व एक डॉक्टर की हत्या कर दी। मेजर बर्टन का सिर काटकर पूरे शहर में घुमाया। अंत में 3 मार्च 1858 ई. में जनरल राबर्टस की सेना ने क्रांतिकारियों को हरा दिया। अंग्रेजों का साथ कोटा महाराज मदनपाल ने दिया। 
  • कोटा का संघर्ष सर्वाधिक सुनियोजित व सुनियंत्रित था। कोटा पर लगभग छः माह तक क्रांतिकारियों का अधिकार रहा। 

 

  • ताँत्या टोपे – 1857 की क्रांति में ताँत्या टोपे ग्वालियर का विद्रोही नेता था। 8 अगस्त 1857 ई. को ताँत्या टोपे मराठा सेना सहित सर्वप्रथम भीलवाड़ा पहुंचे वहां पर जनरल रॉबर्टस की सेना ने उन्हें हरा दिया। इसके बाद व झालावाड़ होते हुए ग्वालियर चले गए 11 दिसंबर 1857 में ताँत्या टोपे पुनः मेवाड़ आए व बांसवाड़ा पर अधिकार कर लिया। यहां से वो जयपुर होते हुए सीकर पहुंचे तो वहां कर्नल होम्स की सेना ने उन्हें हरा दिया। अंत में नरवर के जागीरदार मानसिंह नरूका ने विश्वासघात कर ताँत्या टोपे को अंग्रेजों के हाथ पकड़वा दिया। 18 अप्रैल 1859 में उन्हें सिप्री (मध्यप्रदेश) में फाँसी दे दी गई। 
  • इस प्रकार मारवाड़, मेवाड़, और जयपुर नरेशों से ताँत्या टोपे को किसी प्रकार का सहयोग नहीं मिला। राजस्थान में किसान आंदोलनों का प्रमुख कारण जागीरदारों द्वारा किसानों से खिराज के अलावा लगभग 300 प्रकार की लागतें वसूलना था जैसे-तलवार बंधाई, चंवरी आदि। इसके अलावा ये निःशुल्क श्रम (बेगार) भी करवाते थे। 

 

राजस्थान के किसान आंदोलन 

1.बिजोलिया किसान आंदोलन (1897-1941ई.)-

यह राजस्थान का प्रथम संगठित किसान आंदोलन था। इस आंदोलन के प्रवर्तक साधू सीताराम दास थे। बिजोलिया (भीलवाड़ा) मेवाड़ राज्य का प्रथम श्रेणी का ठिकाना था। बिजोलिया की स्थापना अशोक परमार ने की। अशोक परमार खानवा के युद्ध (1527 ई.) में राणा सांगा की तरफ से युद्ध लड़ा था। उसकी वीरता से प्रभावित होकर सांगा ने उसे ऊपरमाल (भैंसरोड़गढ़ से बिजोलिया के बीच का स्थान) की जागीर दे दी। इस ऊपरमाल का प्रमुख ठिकाना बिजोलिया था। 

  • बिजोलिया में भू-राजस्व की लाटा एवं कूँता पद्धति प्रचलित थी। इसके अनुसार यदि किसान राजस्व का भुगतान न करे तो उसे भूमि से बेदखल कर दिया जाता था। 
  • 1897 में बिजोलिया के रावकृष्ण सिंह द्वारा जनता से भारी लगान व 84 प्रकार का कर लिया जाता था इनमें खिचड़ी कर, कमठा कर, पतल कर प्रमुख थे। वहां से किसानों ने नानजी पटेल व ठाकरी पटेल को उदयपुर भेजकर इसकी शिकायत महाराणा फतेह सिंह से की परंतु फतेह सिंह ने कोई कार्यवाही नहीं की। इससे रावकृष्ण सिंह के हौसले बढ़ गए और उसने ऊपरमाल की जनता पर 1903 में चंवरी नामक कर भी लगा दिया। इस कर के अनुसार जागीर के प्रत्येक व्यक्ति को अपनी लड़की की शादी के अवसर पर पांच रूपये राजकोष में देने होते थे। इसके विरोधी में किसानों ने लड़कियों की शादी करना बंद कर दिया व खेतों में काम करना बंद कर दिया तब कृष्ण सिंह ने चंवरी कर हटा लिया। 
  • कृष्ण सिंह की मृत्यु के बाद 1906 में उसके उत्तराधिकारी पृथ्वीराज ने किसानों पर तलवार बंधाई (उत्तराधिकारी शुल्क) नामक कर लगा दिया व लगान की रकम दुगुनी कर दी। किसानों ने साधुसीताराम दास के नेतृत्व में आंदोलन किया। 1914 में पृथ्वीराज की मृत्यु के बाद यह आंदोलन कुछ समय के लिए रूक गया। 
  • 1916 ई. में साधु सीतारामदास ने किसान पंच बोर्ड की स्थापना की। 
  • 1916 ई. में साधु सीताराम दास के आग्रह पर विजय सिंह पथिक (भूपसिंह) इस आंदोलन से जुड़ गए और पथिक ने 1916 से 1927 ई. तक इस आंदोलन का नेतृत्व किया। पथिक ने 1917 में ऊपरमाल पंच बोर्ड की स्थापना की। पथिक ने रक्षाबंधन के अवसर पर बिजोलिया के किसानों की तरफ से प्रमुख क्रांतिकारी गणेश शंकर विद्यार्थी को राखी भेजी।
  • कानपुर से प्रकाशित समाचार पत्र ‘प्रताप‘ के माध्यम से पथिक ने बिजोलिया आंदोलन को पूरे भारत में चर्चा का विषय बना दिया। 
  • बिजोलिया के किसानों की मांगों की जांच के लिए अप्रैल 1919 में बिंदुलाल भट्टाचार्य की अध्यक्षता में प्रथम जांच आयोग बैठा। इस आयोग ने लगान समाप्त करने की अनुशंसा की परंतु इसका पालन नहीं हुआ। 
  • फरवरी 1922 में ए.जी.जी., हॉलैंड को बिजोलिया भेजा गया। इन्होंने किसानों से समझौता किया इसके अनुसार 84 में से 35 लागते समाप्त कर दी गई और पंचायतों को भी मान्यता मिल गई। यह समझौता अधिक देर तक लागू न हो सका। 
  • 1927 में पथिक व माणिक्य लाल वर्मा में मतभेद हो गए और विजय सिंह पथिक इस आंदोलन से पृथक हो गए तब 1927 में जमनालाल बजाज ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया। 
  • अंत में 1941 में मेवाड़ के प्रधानमंत्री सर टी.विजय राघवाचार्य व राजस्व मंत्री मोहन सिंह मेहता का किसानों से समझौता हो गया और 44 वर्ष बाद (1941) में यह आंदोलन समाप्त हो गया। 
  • यह भारत वर्ष का प्रथम व्यापक और शक्तिशाली किसान आंदोलन था। 

 

2.बेगूँ किसान आंदोलन (चित्तौड़गढ़) –

1921 ई. में बेगूँ के किसान भी बिजोलिया की तर्ज पर मेनाल (भीलवाड़ा) नामक स्थान पर लगान व बेगार के विरोध में एकत्र हुए। पथिक ने इस आंदोलन का नेतृत्व रामनारायण चौधरी को सौंपा। दो वर्ष के बाद (1923 ई.) बेगूँ के ठाकुर अनूप सिंह व राजस्थान सेवा संघ (किसानों) के मध्य समझौता हो गया परंतु अंग्रेज सरकार ने इस समझौते को बोल्शैविक फैसला कहकर अनूपसिंह को उदयपुर में नजरबंद कर दिया। 

  • जून, 1923 में किसानों की समस्या को हल करने के लिए ट्रैन्च आयोग गठित हुआ। इस आयोग के निर्णय पर विचार करने के लिए किसान गोविंदपुरा (भीलवाड़ा) में एकत्र हुए तब सेना ने किसानों को घेरकर गोलियां चलवा दी जिससे रूपाजी व कृपाजी नामक दो किसान शहीद हो गए। 
  • इसके बाद विजय सिंह पथिक ने स्वयं बेगूँ आंदोलन की बागडोर संभाली और अंत में 1923 में ही किसानांे का प्रशासन के साथ समझौता हो गया और बेगार प्रथा भी समाप्त हो गई। 

 

3. निमूचणा किसान आंदोलन (अलवर)-

   1924 में अलवर के महाराजा जयसिंह ने लगान की दरें बढ़ा दी। इसके विरोध में वहां के मेव किसानों ने 24 मई 1925 में निमूचणा गांव में सभा की। सेना ने इस सभा को घेरकर अंधाधुंध गोलियां चलाई, जिससे सैकड़ों किसान मारे गए। महात्मा गांधी ने इस कांड को जलियाँवाला बाग हत्याकांड से भी वीभत्स (भयंकर) बताया। इसे ‘‘Dyrism Double Distilled‘‘की संज्ञा दी। 

 

4. अलवर किसान आंदोलन – अलवर में जंगली सूअरों को अनाज खिलाकर पाला जाता था। ये सूअर किसानों की खेत में खड़ी फसल को नष्ट कर देते थे। सूअरों को मारने पर पाबंदी थी। इस समस्या के निराकरण हेतु 1921 में किसानों ने आंदोलन शुरू किया व सरकार ने सूअरों को मारने की इजाजत दे दी। 

 

5. बूँदी किसान आंदोलन – 1926 में ‘पंडित नयनू राम शर्मा‘ के नेतृत्व में बूँदी में किसानों ने लगान व बेगार के विरोध में आंदोलन छेड़ा तथा डाबी (बूँदी) नामक स्थान पर किसान सम्मेलन में पुलिस ने गोली चला दी, जिससे स्टेज पर झ.डा गीत गाते समय नानक जी भील को गोली लगने से मृत्यु हो गई। 

 

6. दूधवा-खारा आंदोलन (बीकानेर) – बीकानेर रियायत (वर्तमान चूरू जिला) के दूधवा खारा गांव के किसानों ने जागीरदारों से अत्याचारों के विरूद्ध आंदोलन किया। इसका नेतृत्व वैद्य मघाराम व रघुवर दयाल गोयल ने किया। 

 

7. मारवाड़ कृषक आंदोलन – जयनारायण व्यास ने 1923 में मारवाड़ हितकारिणी सभा का गठन कर मारवाड़ के किसानांे में जागरूकता पैदा की। 

 

8. तौल-आंदोलन – 1920-21 में मारवाड़ सरकार द्वारा 100 तौले के सैर को 80 तौले के सैर में परिवर्तित करने के विरोध में चांदमल सुराणा व उनके साथियों द्वारा किया गया आंदोलन तौल आंदोलन कहलाया। 

 

राजस्थान के जनजातीय आंदोलन 

 

मीणाओं ने जयपुर रियायत के विरूद्ध और भीलों ने ब्रिटिश शासन के संरक्षित डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ व मेवाड़ राज्य के विरूद्ध आंदोलन किया। 

  1. भगत आंदोलन – गोविंद गिरी द्वारा भीलों में राजनीतिक व सामाजिक चेतना लाने हेतु किया गया। मुख्यतः डूंगरपुर व बांसवाड़ा में चलाया गया। 1883 ई. में गोविंद गिरी द्वारा ‘सम्प सभा‘ का गठन कर सामाजिक कुरीतियों को दूर करने का प्रयास किया गया। गोविंद गिरि ने मानगढ़ पहाड़ी (गुजरात) को अपना कार्यस्थल बनाया। जहां 7 दिसंबर 1908 में हजारों की संख्या में एकत्रित आदिवासियों पर सेना ने गोलियां चलाई। जिसमें लगभग 1500 भील मारे गये एवं गोविंद गिरि गिरफ्तार किये गये। उन्होंने अपना शेष जीवन कम्बाई (गुजरात) में बिताया। 

 

  1. एकी आंदोलन/भोमट भील कृषक आंदोलन – 1921 में मोतीलाल तेजावत (डूंगरपुर) द्वारा भीलों व गरासियों के हित में भोमट क्षेत्र में चलाया गया आंदोलन। इस सम्मेलन का उद्देश्य लोगों को भारी लगान व बेगार से मुक्ति दिलाना था। इसकी शुरूआत चित्तौड़गढ़ की राशमी तहसील के मातृकु.डिया से की गई है। इन्होंने 21 सूत्री मांग पत्र तैयार किया जिसे ‘‘मेवाड़ पुकार‘‘ कहा जाता है। 7 मार्च 1922 को नीमड़ा गांव में एकत्रित भीलों पर सैनिकों की अंधाधुंध फायरिंग से लगभग 1200 भील मारे गये। जिसे दूसरा जलियाँवाला हत्याकांड कहा गया। 

 

  1. बनवासी सेवा संघ – भीलों सहित सभी आदिवासियों में जनजागरण की लहर लाने के लिए भोगीलाल पांडया व अन्य समाज सुधारकों ने वनवासी सेवा संघ की स्थापना की। इन्होंने आदिवासी भीलो के लिए विद्यालय, प्रौढ़ शिक्षा केंद्र व छात्रावास आदि सुविधाएं उपलब्ध करवाई। 

 

  1. मीणा आंदोलन – 1924 ई. में जयपुर राज्य द्वारा पारित ‘क्रिमिनल क्राईम एक्ट‘ तथा जरायम पेशा कानून 1930 के तहत चौकीदार मीणाओं के सभी स्त्री-पुरूषों को रोजाना थाने में उपस्थिति देने के लिए पाबंद किया गया। जिसके विरोध में 1933 में मीणा क्षत्रिय महासभा का गठन हुआ। 1945 में मीणाओं को रोजाना थाने में उपस्थित होने से छूट दे दी गई। 1952 में जरायम पेशा कानून रद्द हो गया। 

 

जन आंदोलन व प्रमुख क्रांतिकारी गतिविधियाँ

26 जनवरी 1930 को चूरू के धमस्तूप के शिखर पर चन्दनमल बहड़, स्वामी गोपाल दास व साथियों ने तिरंगा फहराया। 

बीकानेर षडयंत्र अभियोग 1932-1931 में गोलमेज सम्मेलन (लंदन) में भाग लेने गये बीकानेर के महाराजा गंगासिंह के विरूद्ध चंदनमल बहड़ व साथियों ने ‘बीकानेर एक दिग्दर्शन‘ (बीकानेर राज्य की वास्तविक स्थिति हेतु) नामक पुस्तिका वितरित की। परिणामस्वरूप चन्दनमल बहड़, सत्यनारायण, स्वामी गोपालदास, लाला खूबराम सर्राफ व साथियों पर राजद्रोह का झूठा मुकदमा चला एवं कड़ी सजायें दी गई। जिसे बीकानेर षड़यंत्र अभियोग 1932 के नाम से जाना जाता है। 

डाबड़ा काण्ड -13 मार्च 1947 को डाबड़ा गांव (डीडवाना) में किसान सभा ओर मारवाड़ लोक परिषद् की ओर से बुलाया गया सम्मेलन जिसमें मथुरादास व अन्य कार्यकर्ता श्री मोतीलाल चौधरी के घर ठहरे थे। जिन पर डाबड़ा के जागीरदारों ने हमला कर कई किसानों को मौत के घाट उतार दिया। 

मेयो कॉलेज बम काण्ड 1934-1934 में वायसराय की अजमेर यात्रा के दौरान उनकी हत्या के इरादे से ज्वाला प्रसाद व फतेह चंद ने मेयो कॉलेज के समीप बम व हथियार छिपा दिए परंतु उनकी यह योजना विफल हो गई। 

  • 1 जनवरी 1930 को लार्ड कर्जन के दिल्ली दरबार में जाने से महाराणा फतेहसिंह को उनके दरबारी कवि व स्वतंत्रा सेनानी केसरी सिंह बारहठ ने ‘चेतावनी रा चूंगट्या‘ के 13 सोरठों के माध्यमों से रोका। 1911 में वे दिल्ली के जॉर्ज पंचम् के दरबार में भी शामिल नहीं हुये थे। 
  • स्वामी दयानंद सरस्वती – आर्य समाज के संस्थापक व सत्यार्थ प्रकाश के रचियता मई 1883 में जोधपुर महाराजा के निमत्रंण पर जोधपुर आये। विष देने के कारण अजमेर में 30 अक्टूबर 1883 में मृत्यु हुई। सत्यार्थ प्रकाश का अधिकतर भाग उदयपुर में लिखा गया। 
  • प्रयाण सभाएं – डूंगरपुर प्रजामण्डल द्वारा 1944 में रियासती शासन की अन्यायपूर्ण नीतियों के विरूद्ध जनजागृति हेतु आयोजित सभाएं। 
  • नरेन्द्र मंडल – 1919 में मांटेग्यू चेम्सफोर्ड अधिनियम के सुझाव के अनुसार 3 फरवरी 1921 में रियासती राजाओं ने नरेंद्र मंडल की स्थापना की। बीकानेर महाराजा गंगासिंह इसके प्रथम चांसलर बने। 
  • 12 नवंबर 1930 को लंदन में हुये प्रथम गोलमेज सम्मेलन में राजस्थान के राजाओं के प्रतिनिधि के रूप में बीकानेर महाराजा गंगासिंह, अलवर नरेश जयसिंह, धौलपुर महाराजा उदयभानसिंह ने भाग लिया। 

 

 प्रजामंडल आंदोलन 

  • 1938 में सुभाषचंद्र बोस की अध्यक्षता में कांग्रेस का हरीपुरा अधिवेशन हुआ जिसमें रियासतों की जनता को अपने राज्य में उत्तरदायी शासन स्थापित करने हेतु अपने-अपने स्वतंत्र संगठन बनाकर आंदोलन करने व जनजागृति फैलाने का आह्वान किया गया। 1938 के बाद राजस्थान की लगभग सभी रियासतों में प्रजामण्डल की स्थापना हुई। जिनका मुख्य उद्देश्य रियासती कुशासन को समाप्त करना व नागरिकों को उनके मौलिक अधिकार दिलाना और उत्तरदायी शासन की स्थापना करना था। 1939 में समस्त भारत की देशी रियासतांे के प्रजामण्डलों का अधिवेशन हुआ। जिसकी अध्यक्षता जवाहरलाल नेहरू ने की।  
  1. जयपुर प्रजामण्डल –

स्थापना 1931 कर्पूरचन्द्र पाटनी व जमनालाल बजाज द्वारा। पुनर्गठन 1937 में जमनालाल बजाज व हीरालाल शास्त्री के सहयोग से हुआ। तब से यहां राजनीतिक कार्य आरंभ हुए। मार्च 1940 में जयपुर प्रजामंडल का पंजीकरण हो गया। 

  • 1942 में जयपुर प्रजामण्डल के अध्यक्ष हीरालाल शास्त्री व जयपुर रियायत के मध्य जेन्टलमेन्ट एग्रीमेंट समझौता हुआ। जिसके तहत् जयपुर प्रजामण्डल को भारत छोड़ो आंदोलन से पृथक रखा गया। जिससे जयपुर प्रजामण्डल में मतभेद हो गए ओर बाबा हरिश्चन्द के नेतृत्व में आजाद मोर्चा पृथक हो गया। 
  • 1945 में जवाहरलाल नेहरू के प्रयासों से आजाद मोर्चा का जयपुर प्रजामण्डल में पुनः विलय हो गया। 1946 में टीकाराम पालीवाल ने राज्य में उत्तरादायी शासन स्थापित करने का प्रस्ताव पारित किया। 
  • 30 मार्च 1949 को जयपुर में उत्तरदायी शासन की स्थापना हुई। 

 

  1. मेवाड़ प्रजामण्डल-

उदयपुर में प्रजामण्डल की स्थापना का श्रेय माणिक्यलाल वर्मा को जाता है। 24 अप्रैल 1938 को श्री बलवंत सिंह मेहता की अध्यक्षता में मेवाड़ प्रजामण्डल की स्थापना हुई। 

  • माणिक्यलाल वर्मा ने मेवाड़ का वर्तमान शासन नामक पुस्तक से मेवाड़ में व्याप्त अव्यवस्था व तानाशाही की आलोचना की। 
  • 11 मई 1938 को मेवाड़ प्रजामण्डल पर लगा प्रतिबंध 22 फरवरी 1941 को हटाया गया। 
  • 25-26 नवंबर 1941 में माणिक्यलाल वर्मा की अध्यक्षता में इसका प्रथम अधिवेशन हुआ। 
  • 31 दिसंबर 1945 व 1 जनवरी 1946 को उदयपुर में अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद् का सातवां अधिवेशन हुआ जिसकी अध्यक्षता जवाहर लाल नेहरू ने की। 
  • 18 अप्रैल 1948 को उदयपुर का राजस्थान में विलय हो गया। 

 

  1. मारवाड़ प्रजामण्डल-
  • राजस्थान में सर्वप्रथम राजनैतिक कार्यक्रम मारवाड़ प्रजामण्डल ने आरंभ किया। 1918 में चांदमल सुराणा ने मारवाड़ सेवा संघ की स्थापना की। 1923 में जय नारायण व्यास, भंवरलाल सर्राफ आदि ने मारवाड़ सेवा संघ को मारवाड़ हितकारिणी सभा में परिवर्तित किया। 
  • गठन-1934 में भंवरलाल सर्राफ की अध्यक्षता में जयनारायण व्यास व आनंदमल सुराणा के प्रयासों से। 1936 में से असंवैधानिक घोषित किया गया। 
  • बालमुकुन्द बिस्सा की जेल में भूख हड़ताल करने से मृत्यु हो गई। 30 मार्च 1948 को जोधपुर में उत्तरादायी शासन की स्थापना व 3 मार्च 1949 को जोधपुर रियायत का राजस्थान में विलय हुआ। 
  • मारवाड़ हितकारिणी सभा ने ‘मारवाड़ की आस्था‘ व ‘पोपाबाई की पोल‘ नामक दो लघु पुस्तिकाएं प्रकाशित की। जिनमें मारवाड़ के किसानों की दयनीय दशा का चित्रण था। 
  • मारवाड़ प्रजामण्डल पर सबसे ज्यादा बार प्रतिबंध लगा था। 

 

  1. डूंगरपुर प्रजामण्डल-
  • डूंगरपुर में भोगीलाल पांड्या ने बागड़ सेवा मंदिर व सेवा संघ की स्थापना की। 1 अगस्त 1944 में भोगीलाल पांड्या की अध्यक्षता में डूंगरपुर प्रजामण्डल की स्थापना हुई। 
  • डूंगरपुर सरकार राजस्थान की ऐसी सरकार थी जिसने शिक्षण व विद्यालय संचालन को द.डनीय अपराध माना। अंत में जनवरी 1948 में यहां उत्तरदायी शासन स्थापित हुआ। 

 

  1. भरतपुर प्रजामण्डल –
  • स्थापना किशनलाल जोशी के प्रयासों से मार्च 1938 में। अध्यक्ष गोपीलाल यादव थे। 1939 में इसका नाम बदलकर भरतपुर प्रजा परिषद् किया गया। 18 मार्च 1948 को भरतपुर का मत्स्य संघ में विलय हो गया। 

 

  1. बीकानेर प्रजामण्डल-
  • स्थापना मघाराम वैद्य ने कोलकाता में 1936 में की। 

 

भारत छोड़ो आंदोलन व उत्तरदायी शासन

 

8 अगस्त 1942 में महात्मा गांधी ने अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा दिया। कोटा में जागृति पंडित नयनूराम शर्मा द्वारा। कोटा एकमात्र ऐसा राज्य था जहां जनता ने 1942 में शहर पर कब्जा कर तिरंगा फहराया व दो सप्ताह तक नगर प्रशासन पर कब्जा करके रखा। 

  • शाहपुरा प्रथम देशी राज्य था जहां जनतांत्रिक व पूर्ण उत्तरदायी शासन की स्थापना हुई। 
  • जैसलमेर एकमात्र ऐसा राज्य था जिसने न तो भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया ओर न ही वहां उत्तरदायी शासन की स्थापना हुई। 
  • अवलर व जयपुर प्रजामण्डल भारत छोड़ो आंदोलन में लगभग निष्क्रिय रहे। 
  • 1948 में जयपुर रियायत में हीरालाल शास्त्री के नेतृत्व में उत्तरदायी शासन की स्थापना हुई। 
  • द्वितीय विश्व युद्ध में बीकानेर के महाराजा गंगासिंह संभवतः भारतीय राजाओं में प्रथम थे। जिन्होंने ब्रिटेन के सम्राट के सामने ब्रिटेन की ओर से महायुद्ध में भाग लेने की इच्छा प्रकट की ओर सेना लेकर यूरोप गये। 
  • राजस्थान में प्रथम लोक अदालत का गठन 1975 में कोटा में हुआ। 
  • राजस्थान में स्थायी प्रथम लोक अदालत मई 2000 में उदयपुर में स्थापित की गई। 
  • राजस्थान देश का प्रथम राज्य है जहां पूरे राज्य में लोक अदालतें स्थापित की गई। 

 

प्रमुख संस्थाएं व संघ
संस्था वर्ष संस्थापक
1. सम्प सभा 1883 गोविंद गिरि द्वारा सिरोही में स्थापित।
2.वीर भारत समाज 1912 विजय सिंह पथिक। 
3. उपरमाल पंच बोर्ड 1917 विजय सिंह पथिक।
4. राजस्थान सेवा संघ 

 

राजस्थान के विभिन्न प्रजामण्डल व संगठन

प्रजामण्डल स्थापना वर्ष संस्थापक, सदस्य
1. जयपुर प्रजामण्डल पुर्नगठन 1931

1936-37

कर्पूर चन्द्र पाटनी।

सेठ जमनालाल बजाज की अध्यक्षता में, अर्जुनलाल सेठी, हीरालाल शास्त्री, चिरंजी लाल मिश्रा, कर्पूर चन्द्र पाटनी।

2. हाड़ौती प्रजामण्डल 1934 पं. नयूनराम शर्मा (अध्यक्ष), प्रभूलाल विजय।
3. मारवाड़ प्रजामण्डल 1934 भंवर लाल सर्राफ, अभयमल जैन, अचलेश्वरप्रसाद
4. बीकानेर प्रजामण्डल 1936 मघाराम वैद्य (अध्यक्ष), लक्ष्मण दास स्वामी। 
5. भरतपुर प्रजामण्डल (1939 में इसका नाम बदलकर भरतपुर प्रजामण्डल परिषद् रखा) 1938 गोपीलाल यादव (अध्यक्ष) किशन लाल जोशी, मा.आदित्येन्द्र, जुगल किशोर चतुर्वेदी, गौरी शंकर मित्तल।
6. मेवाड़ प्रजामण्डल 1938 बलवंत सिंह मेहता (अध्यक्ष), माणिक्य लाल वर्मा, भूरेलाल बया।
7. कोटा प्रजामण्डल 1938 पं. नयनूराम शर्मा (अध्यक्ष), अभिन्न हरितनसुख लाल मित्तल।
8. शाहपुरा प्रजामण्डल 1938 रमेश चंद्र ओझा, लादू राम व्यास, अभय सिंह डांगी।
9. अलवर प्रजामण्डल 1938 पं. हरीनारायण शर्मा, कुंज बिहारी मोदी। 
10. करौली प्रजामण्डल 1938 त्रिलोक चंद्र माथुर, चिरंजी लाल शर्मा, कंुवर मदन सिंह।
11. धौलपुर प्रजामण्डल 1938 कृष्णदत्त पालीवाल, ज्वालाप्रसाद जिज्ञासु, जोहरी लाल
12. सिरोही प्रजामण्डल 1939 गो कुल भाई भट्ट (अध्यक्ष), धर्म चंद सुराणा, रामेश्वर दयाल। 
13. किशनगढ़ प्रजामण्डल 1939 कांतिलाल चौथानी, जमाशाह।
14. कुशलगढ़ प्रजामण्डल 1942 भंवरलाल निगम (अध्यक्ष), कन्हैया लाल सेठिया।
15. बांसवाड़ा प्रजामण्डल 1943 भूपेन्द्रनाथ त्रिवेदी, धूलजी बाई, मणिशंकर नागर।
16. डूंगरपुर प्रजामण्डल 1944 भोगीलाल पांड्या (अध्यक्ष), हरिदेव जोशी, शिवलाल कोटड़िया, नानाभाई।
17. जैसलमेर प्रजामण्डल 1945 मीठालाल व्यास। 
18. प्रतापगढ़ प्रजामण्डल 1945 चुन्नीलाल, अमृत लाल पथिक। 
19. झालावाड़ प्रजामण्डल 1946 मांगीलाल (अध्यक्ष), कन्हैयालाल मित्तल। 
20. बूँदी  राज्य लोक परिषद् 1944 हरीमोहन माथुर (अध्यक्ष), बृज सुंदर शर्मा। 
21. भरतपुर कांग्रेस मंडल  1937  जगन्नाथ कक्कड़।

 

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राजस्थान के ऐतिहासिक स्रोत

राजस्थान के ऐतिहासिक स्रोत

Geetanjali Academy- By Jagdish Takhar

राजस्थान के इतिहास के प्रमुख स्रोत पुरातात्विक सामग्री, साहित्यिक सामग्री व पुरालेख सामग्री है।

  1. पुरातात्विक सामग्री: जैसे शिलालेख, ताम्रपत्र (दान-पत्र), सिक्के, शैलचित्र, स्मारक, मृण मूर्तियों, पत्थर के औजार, मिट्टी के बर्तन आदि। पुरातात्विक सामग्री से अभिप्राय उस सामग्री से है जो खोजों व उत्खनन से मिली है। पुरातात्विक सामग्री अधिक विश्वसनीय, सामयिक व प्रामाणिक दस्तावेज़ है।

(i) शिलालेख: ये प्रायः पत्थरों, शिलाओं आदि पर खुदे हुये मिले है। इनकी भाषा संस्कृत, हिन्दी, राजस्थानी, उर्दू व फारसी है। अधिकांशतः ये महाजनी लिपि (हर्ष लिपि) में खुदे है। इनमें वंशावली, तिथियाँ, विशेष घटनाओं तथा शासन स्वरूप का उल्लेख होता है। जिन शिलालेखो में मात्र किसी शासक की उपलब्धियों की यशोगाथा होती है, उसे ‘प्रशस्ति‘  कहते है, जैसे महाराणा कुम्भा द्वारा निर्मित ‘कीर्ति स्तम्भ की प्रशस्ति‘, महाराणा राजसिंह की ‘राज प्रशस्ति‘ आदि।

शिलालेख स्थान विशेष विवरण
घोसु.डी शिलालेख ( द्वितीय शताब्दी ईसा पू.) घोसु.डी गाँव (नगरी, चित्तौड़)

भाषा-संस्कृत, लिपि-ब्राह्मी

इसमें भागवत धर्म का प्रचार, संकर्शण तथा वासुदेव की मान्यता और अश्वमेघ यज्ञ के प्रचलन का वर्णन
भाबू्र अभिलेख (232 ई.पू.) सबसे पुराना ज्ञात बैराठ (जयपुर) सम्राट अशोक की बौद्ध आस्था का वर्णन
अपराजित का शिलालेख 661 ई. कु.डेश्वर मंदिर, नागदा (उदयपुर) मेवाड़ की धार्मिक स्थिति का वर्णन
मानमोरी का लेख 713 ई. मानसरोवर झील (चित्तौडगढ़) का तट ये अभिलेख कर्नल टॉड को मिला एवं इसमें चित्तौड़ की सामाजिक स्थिति की जानकारी है।
चित्तौड़ का लेख 971 ई. चित्तौडगढ़ इसमें स्त्रियों के मन्दिर में प्रवेश को निषेध बताया है।
बिजोलिया का लेख 1170 ई. पार्श्वनाथ मंदिर, बिजौलिया (भीलवाड़ा) सांभर व अजमेर के चौहान वंश की जानकारी
चीरवे का शिलालेख 1428 ई. चीरवा गाँव, 

उदयपुर

मेवाड़ के गुहिल शासक बप्पा से समरसिंह तक की जानकारी
श्रृंगी ऋषि शिलालेख श्रृंगी ऋषि स्थान (एकलिंग जी) मेवाड़ के राणा हम्मीर से मोकल तक की जानकारी तथा भीलों के सामाजिक जीवन की जानकारी
रणकपुर प्रशस्ति 1439 ई. जैन चौमुखा मंदिर, रणकपुर मेवाड़ के बप्पा रावल से कुम्भा तक का उल्लेख
कुम्भलगढ़ अभिलेख 1460 ई. कुम्भलगढ़ (राजसमंद) मेवाड़ शासकों की शुद्ध वंशावली
कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति 1460 ई. चित्तौड़ दुर्ग में कीर्तिस्तम्भ पर उत्कीर्ण श्लोक महाराणा कुम्भा द्वारा रचित चंडीशतक, संगीतराज, गीत गोविन्द टीका का उल्लेख है।
आमेर का लेख 1612 ई. आमेर (जयपुर) कच्छवाहा वंश की मुगलों से सम्बन्धों की जानकारी
राजप्रशस्ति  (1676 ई.)  विश्व का सबसे बड़ा शिलालेख राजसमंद झील के किनारे रणछोड़ भट्ट द्वारा रचित मेवाड़ के राजाओं व राजसिंह की उपलब्धियों का वर्णन
अजमेर अभिलेख (1200 ई.) राजस्थान में फारसी का सबसे पुराना अभिलेख अढ़ाई दिन के झोपड़े की दीवार पर (अजमेर) इसमें मस्जिद निर्माण करने वाले व्यक्तियों के नाम हैं।
धाई बी.पीर की दरगाह का लेख (1325 ई.) (फारसी अभिलेख) चित्तौडगढ़ इसमें चित्तौड़ का नाम खिज्राबाद अंकित है।
आहड़ ताम्रपत्र (दान-पत्र) 1206 ई. आहड़ (उदयपुर) इसमें गुजरात के सोलंकी राजाओं की वंशावली का वर्णन है।
प्रतापगढ़ (ताम्रपत्र) 1641 ई. प्रतापगढ़ (चित्तौडगढ़) इसमें ‘टंकी‘ नामक कर का उल्लेख है, जो ब्राह्मणों पर लगता था।

(ii)  सक्के: सिक्के लेन-देन, व्यापार, राजकीय आय व आर्थिक व्यवस्था के स्तम्भ माने जाते है। ये सिक्के सोने, चाँदी, ताम्बे तथा सीसे के होते थे। राजस्थान में रेढ़ (टोंक) में चाँदी के ‘पंचमार्क सिक्के‘ मिले है जो कि भारत के प्राचीनतम सिक्के है तथा ये मालवा जनपद के सिक्के है। जोधपुर के महाराजा गजसिंह के समय गधिया सिक्के चलते थे। इन पर गधे के मुख अंकित थे। मुगल साम्राज्य के पतन के दौरान जोधपुर के शासकों ने विजयशाही सिक्के चलाये तथा जयपुर में कच्छवाहा शासकों ने झाड़शाही सिक्के चलवाये। ब्रिटिश शासन के बाद चाँदी के कलदार सिक्कों का प्रचलन हुआ। अकबर को चित्तौड़ विजय के उपरान्त मेवाड़ में ‘एलची सिक्के‘ चले। चांदोड़ी सिक्के मेवाड़ में तथा अखैशाही सिक्के जैसलमेर  में और स्वरूपशाही सिक्के उदयपुर में प्रचलित थे।

(iii)    स्मारक: विभिन्न प्रकार के भवन जैसे महल, मंदिर, दुर्ग, समाधियाँ, छतरियाँ, स्तूप, हवेलियाँ आदि भी इतिहास के निर्माण के महत्वपूर्ण स्रोत हैं।

(iv)    मृण मूर्तियां, बर्तन, औजार: उत्खनन से मिट्टी की अनेक मूर्तियां, बर्तन तथा पत्थर, ताम्बे व लौहे के औजार प्राप्त हुये हैं जो कि इतिहास निर्माण के महत्वपूर्ण स्रोत है।

  1. पुरालेखीय स्रोत: लिखित दस्तावेज़ पुरालेख कहलाते हैं। इनमें बहियाँ, पट्टे, परवाने, फरमान, खरीता, रूक्के आदि सम्मिलित है। यह सब रिकॉर्ड राज्य के पुरालेख संग्रहालयों जयपुर, जोधपुर, कोटा, उदयपुर व बीकानेर में सुरक्षित है। राजस्थान राज्य अभिलेखागार का मुख्यालय बीकानेर में स्थित है। 1955 में इसकी स्थापना जयपुर में हुई परन्तु 1960 में ये बीकानेर स्थानान्तरित हो गया। 16वीं शताब्दी में राजस्थान के शासकों में इस तरह का रिकॉर्ड रखा जाता था।

बहियाँ:

(i) जिन बहियोें में राजा के दैनिक कार्यों का उल्लेख होता था, उन्हें हकीक़त बही कहा जाता था।

(ii)  जिन बहियों में राजा के शासकीय आदेशों की नकल होती थी, उन्हें हुक़ूमत बही कहा जाता था।

(iii) जिन बहियों में राजा को प्राप्त होने वाले महत्वपूर्ण पत्रों की नकल होती थी, उन्हें खरीता बही कहा जाता था।

(iv) शाही परिवार के विवाह सम्बन्धित आलेख विवाह बही में किये जाते थे।

(v) राजकीय भवनों, महलों पर होने वाले खर्च का लेखा-जोखा कठमाना बही में किया जाता था।

(vi) भूमि में रिकार्ड सम्बन्धी बही अडसट्ठा बही कहलाती थी।

खरीता: जो पत्र एक शासक द्वारा दूसरे शासक को भेजे जाते थे।

परवाना: जो पत्र एक शासक द्वारा अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को भेजे जाते थे।

अखबारात: मुगल दरबार द्वारा प्रकाशित दैनिक समाचारों का संग्रह।

फरमान, रूक्के: ये मुगल सम्राट द्वारा शाही वंश के लोगों या विदेशी शासकों के नाम भेजे जाते थे।

निशान: शहजादों व बैगमों द्वारा लिखे पत्र थे।

  1. साहित्यिक सामग्री: इसके अंतर्गत संस्कृत, अपभ्रश, अंग्रेजी, हिन्दी, फारसी, राजस्थानी भाषाओं में लिखे ग्रंथ आते हैं।

राजस्थान के विभिन्न अंचलों के प्राचीन नाम 

प्राचीन नाम अँचल राजधानी
1 यौद्धेय प्रदेश गंगा नगर के आसपास के क्षेत्र  
2 जाँगल प्रदेश बीकानेर व जोधपुर जिले अहिच्छत्र पुर
3 सपाद लक्ष (सांभर) जांगल प्रदेश का पूर्वी भाग
4. मरू(मारवाड़) जोधपुर मंडोर 
5.  गुजर्रत्रा जोधपुर का दक्षिण व पाली का समीपवर्ती भाग
6 मांड (वल्ल व दुग्गल) जैसलमेर, बाड़मेर का क्षेत्र जैसलमेर
7 मेदपाट (मेवाड़) उदयपुर, राजसमन्द, चित्तौडगढ़, भीलवाड़ा, बांसवाड़ा व डूंगरपुर क्षेत्र चित्तौडगढ़
8 शिवि उदयपुर का क्षेत्र मध्यमिका
9 बागड़ (व्याग्रघाट) डूंगरपुर व बांसवाड़ा का क्षेत्र
10 चंद्रवर्ती (अर्बुद प्रदेश) सिरोही व आबू के आसपास का क्षेत्र
11 ढूंढाड़ जयपुर के आसपास का क्षेत्र
12 हाड़ौती (हेय-हेय प्रदेश) कोटा, बूँदी, बांरा व झालावाड़ का क्षेत्र बूंदी
13 मालवा प्रदेश झालावाड़
14 मत्स्य प्रदेश पश्चिमी अलवर, जयपुर व भरतपुर का कुछ भाग बैराठ
15 शूरसेन प्रदेश पूर्वी अलवर, भरतपुर, धौलपुर व करौली मथुरा
16 कुरू प्रदेश अलवर का उत्तरी भाग
17 मेवात अलवर
18 मेरवाड़ा अजमेर के आसपास का क्षेत्र
19 श्रीमाल/भीनमाल/सुवर्ण गिरि जालौर
20 शेखावाटी चुरू, सीकर व झुंझुनू
21 भोमट डूंगरपुर पूर्वी सिरोही व उदयपुर
22 डांगक्षेत्र धौलपुर, करौली व सवाई माधोपुर क्षेत्र

नोट:

(i) अलवर ऐसी जगह है जो कि मत्स्य, शूरसेन व कुरू प्रदेश में बँटा था।

(ii)  बीकानेर के राजा जांगलधर बादशाह कहलाते थे। जांगल प्रदेश की राजधानी अहिच्छत्रपुर थी।

राजस्थान की प्राचीन सभ्यताएँ

    • राज्य के दक्षिणी पूर्वी तथा पूर्वी भागों से प्राप्त पुरावशेषों से यह अनुमान लगाया गया है कि लगभग 1 लाख वर्ष पूर्व (पूर्व पाषाण काल) मानव पत्थरों से बेडोल औजारों का प्रयोग करता था। इस समय मानव राजस्थान में बनास, चम्बल, गम्भीरी, बेड़च और लूनी नदियों के किनारे निवास करता था।
    • मध्य पाषाण काल (50 हजार वर्ष पूव) में मानव आयताकार व गोल औजारों का प्रयोग करने लगा।
    • राजस्थान में मानव सभ्यता की आधार शिला उत्तर पाषाण काल (10 हजार वर्ष पूव) में रखी गई। इस काल में पहिये का आविष्कार हुआ, मानव ने खेती आरम्भ की और कपास की खेती कर कपड़ा बुनने का कार्य आरम्भ किया।
    • ऋग्वेद के अनुसार श्रीगंगानगर जिले की पूर्वी सीमा पर दृषद्वती नदी तथा पश्चिमी सीमा पर सरस्वती नदी (घग्घर) बहती थी। उस समय इस भाग को ब्रह्मवर्त कहते थे।
    • पहले थार के मरूस्थल की जगह टेथिस महासागर था। इस महासागर में दृषद्वती, सरस्वती व आहड़ नदियाँ आकर मिलती थी।
    • कालीबंगा (हनुमानगढ़) व आहड़ (उदयपुर) के उत्खनन से यह प्रमाणित होता है कि ये दोनों सभ्यताएँ सिन्धु घाटी सभ्यता (हडप्पा व मोहनजोदाड़ो) के समकालीन है।
  • राजस्थान की प्राचीन सभ्यता की खोज सर्वप्रथम आरेल स्टाईल ने की थी।

1. कालीबंगा सभ्यता:

    • इस सभ्यता के अवशेष अनूपगढ़ के पास व कालीबंगा में मिले थे। इस स्थल की खोज सर्वप्रथम अमलानंद घोष ने 1952 ई. में की। 1961 से 1969 तक बी.वी.लाल और बी.के.थापर ने यहाँ उत्खनन कार्य किया। कालीबंगा हनुमानगढ़ जिले की प्राचीन सरस्वती (घग्घर) नदी के किनारे स्थित है। कालीबंगा का शाब्दिक अर्थ ‘काली चूड़ियाँ‘ है। कालीबंगा सभ्यता राजस्थान की सबसे प्राचीन सभ्यता हैं।
    • कालीबंगा में दो टीलों का उत्खनन किया गया। पश्चिमी टीला छोटा (गढ़ी क्षेत्र), जिससे पूर्व हड़प्पाकालीन सभ्यता (2400 ई.पू.) के अवशेष प्राप्त हुये हैं तथा दूसरा पूर्वी टीला (नगर क्षेत्र), जिससे हड़प्पाकालीन सभ्यता (2300 ई.पू.) के अवशेष मिले हैं। दोनों टीले एक सुरक्षा प्राचीर से घिरे हैं। इसलिये इस सभ्यता को हड़प्पा सभ्यता के नाम से जाना जाता है। राजस्थान सरकार ने कालीबंगा से प्राप्त पुरावशेषो के संरक्षण हेतु यहाँ एक संग्रहालय की स्थापना की है। पाकिस्तान में कोटदीजी नामक स्थान से प्राप्त अवशेष कालीबंगा के अवशेषों से मिलते-जुलते हैं।
    • कालीबंगा में उत्खनन से यह सिद्ध हुआ है कि यह एक नगरीय प्रधान सभ्यता थी। यहाँ नगर नियोजन सुनियोजित नक्शे के आधार पर किया गया था। सड़के एक-दूसरे को समकोण पर काटती थी। मकान कच्ची ईंटों (30 20 10 से.मी.) के बनाए जाते थे। ईटों को धूप में पकाया जाता था। घरों से गंदे पानी के निकास के लिये पक्की ईंटों की नालियाँ एवं शोषण पात्रों का प्रयोग होता था। कुएँ के निर्माण के लिये पक्की ईंटों का प्रयोग होता था। नालियाँ ढ़की हुई थी।
    • यहाँ की एक बस्ती एक सुरक्षात्मक दीवार (परकोटे) से सुरक्षित की गई थी। यह दीवार 4.10 मीटर चौड़ी थी, जिसका निर्माण कच्ची ईंटों (30 20 10 से.मी.) से किया गया था। यह दीवार उत्तर से दक्षिण की और 250 मीटर लंबी तथा पूर्व से पश्चिम की ओर 180 मीटर चौड़ी थी।
    • पश्चिम छोटे टीले से यहाँ दोहरे जुते हुये खेत के अवशेष मिले हैं। इस खेत में एक साथ दो फसलें जौं एवं गेहूँ उगाई जाती थी।
    • यहाँ उत्खन्न से लाल काले मृदभा.ड, हवन कुण्ड, चूड़ियाँ, तन्दूर के आकार के चुल्हे तथा छत पर जाने के लिये सीढ़ियां मिली हैं। इसके अलावा खड़िया मिट्टी से बनी मुद्राएँ भी मिली है। यहाँ के भवनों की छतें लकड़ी की तिलियों व मिट्टी से बनी होती थी।
    • पश्चिमी टीलें की खुदाई से एक बहुत बड़ा मिट्टी का चबूतरा मिला है।
    • यहाँ के निवासी मृतक के शव को गाड़ते थे तथा मृतक के पास बर्तन व गहने रखते थे।
    • यहाँ से प्राप्त मुहरों पर सैंधव लिपि (चित्र लिपि) मिली है। जो अब तक पढ़ी नहीं जा सकी है। इस लिपि के अक्षर एक-दूसरे के ऊपर लिखे हुये प्रतीत होते हैं तथा ये लिपि सम्भवतः दाएँ से बाएँ लिखी जाती होगी। इस सभ्यता से स्नानागार के अवशेष नहीं मिले हैं।
  • कालीबंगा से प्राप्त एक मुहर पर व्याघ्र (बाघ) का चित्र अंकित हैं।

2. आहड़ सभ्यता: यह सभ्यता उदयपुर जिले में आहड़ (बेड़च) नदी घाटी में विद्यमान थी। यह सभ्यता दो स्थलों आहड़ (उदयपुर) व गिलुण्ड  (राजसमंद) में विस्तृत थी। आहड़ पर्वत मालाओं व एक नदी से घिरी थी, जबकि गिलुंड नदी-घाटी व मैदान मे विस्तृत थी। गिलुंड के एक और बनास नदी थी। आहड़ संस्कृति ग्रामीण थी।

    • आहड़ का प्राचीन नाम ताम्रवती नगरी था क्योंकि यहाँ प्राचीन काल में ताम्बे के औजार बनाने का प्रमुख केन्द्र था। आहड़ के लोगों का प्रमुख व्यवसाय धातुकर्म था।
    • स्थानीय लोग आहड़ को धूलकोट, आघाटपुर या आघात दुर्ग भी कहते थे।
    • उत्खनन: इस स्थल का उत्खनन सर्वप्रथम 1953 ई. में अक्षय कीर्ति व्यास के नेतृत्व में हुआ। 1954-56 में रतन चंद्र अग्रवाल ने 1961-62 में एच. डी. सांकलिया के नेतृत्व में यहाँ उत्खनन हुआ।
    • यहाँ से लाल व काले मृदभांड (मिट्टी के बर्तन) प्राप्त हुये हैं, जिन्हें उल्टी तपाई शैली से पकाया जाता था।
    • यहाँ के लोग धूप में पकाई ईंटों व पत्थरों से मकान बनाते थे। आहड़ से कच्ची ईंटों, गारे व पत्थर से बने मकान मिले हैं, जबकि गिलुंड से पक्की ईंटों की दीवारे मिली हैं।
    • यहाँ के लोग कृषि से परिचित थे तथा अन्न पकाकर खाते थे। इनकी अर्थव्यवस्था का प्रमुख साधन पशुपालन था।
    • यहाँ के लोग अनाज का भंडारण बड़े-बड़े मृदभांड में करते थे। जिन्हें यहाँ ‘गोरे‘ व ‘कोठ‘ कहा जाता था।
    • यहाँ खुदाई से ताम्बे की छह मुद्राएँ व तीन मोहरें प्राप्त हुई हैं। एक मुद्रा पर त्रिशूल उत्कीर्ण है।
    • आहड़ में एक घर में एक साथ छह चूल्हे प्राप्त हुये हैं। इनमें से एक पर मानव हथेली की छाप भी प्राप्त हुई है।
    • यहाँ मातृदेवी व बैल की मृणमूर्ति और दीपक प्राप्त हुये हैं।
    • यहाँ के लोग मृतकों को आभूषणों के साथ दफनाते थे।
  • यहाँ का प्रमुख उद्योग ताम्बा गलाना एवं इसके उपकरण बनाना था।

3.गणेश्वर सभ्यता (सीकर): गणेश्वर का टीला, तहसील – नीम का थाना, जिला सीकर में कांतली नदी के उद्गम स्थल पर स्थित है। यह सभ्यता 2800 ई. पूर्व विकसित हुई तथा ताम्रयुगीन संस्कृतियों में सबसे पुरानी है। इसलिये इसे ताम्रयुगीन संस्कृतियों की जननी कहा जाता है।

    • इस स्थल का उत्खनन 1977 ई. में आर. सी. अग्रवाल और विजय कुमार ने किया।
    • यह सभ्यता सीकर, झुंझुनू, जयपुर तथा भरतपुर तक फैली हुई है।
    • विश्व प्रसिद्ध खेतड़ी (झुंझुनू) यहाँ स्थित है।
    • यहाँ मकान पत्थरों के बनाए जाते थे तथा ईंटों का बिलकुल भी प्रयोग नहीं होता था।
    • लोग माँसाहारी थे तथा मछली पकड़ने के शौकीन थे। यहाँ मछली पकड़ने का काँटा मिला है।
  • गणेश्वर सभी हड़प्पा स्थलों को ताम्र धातु की आपूर्ति करता था।

4. बैराठ सभ्यता (जयपुर): बैराठ (विराट नगर) प्राचीन समय में मत्स्य जनपद की राजधानी थी तथा मौर्यकाल में बौद्धधर्म का प्रमुख केन्द्र था। चीनी यात्री ‘फाह्यान‘ बैराठ में ही आया था।

    • बैराठ में बीजक की पहाड़ी, भीम डूंगरी तथा महादेव डूंगरी आदि स्थानों पर प्रथम बार उत्खनन 1937 में दयाराम साहनी ने किया था तथा खुदाई से मौर्यकालीन व उससे पूर्व की सभ्यता के अवशेष मिले हैं।
    • पांडव अपने अज्ञातवास के दौरान एक वर्ष बैराठ में रहे थे।
    • बैराठ से पाषाणयुगीन व मौर्ययुगीन संस्कृतियों के अवशेष प्राप्त हुये हैं।
    • यहाँ पाषाणयुगीन हथियारों का एक बहुत बड़ा कारखाना था, जहाँ से कुल्हाड़ियाँ व औजार मिले हैं।
    • 1837 ई. में कैप्टन बर्ट ने बीजक डूंगरी पर मौर्यकालीन ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण सम्राट अशोक का शिलालेख खोजा था। स्थानीय लोग इस लेख को ‘बीजक‘ कहकर पुकारते थे। इसलिये इस पहाड़ी का नामकरण भी ‘बीजक पहाड़ी‘ हो गया।
    • बीजक पहाड़ी पर सम्राट अशोक द्वारा निर्मित गोल बौद्ध मंदिर व बौद्ध मठ के अवशेष प्राप्त हुये हैं। यहाँ से सम्राट अशोक का भाब्रू शिलालेख भी प्राप्त हुआ है।
    • उत्खनन से प्राप्त मृतभा.ड पर त्रिरत्न व स्वास्तिक के चिन्ह मिले हैं।
    • यहाँ शैलखंडों पर शंख लिपि के प्रमाण मिले हैं। शंख लिपि में प्रयुक्त अक्षर शंख की आकृति से मेल खाते हैं।
    • विराट नगर में अकबर ने एक टकसाल खोली थी। जिसमें अकबर जहाँगीर व शाहजहाँ के काल में ताम्बे के सिक्के ढाले जाते थे।
    • ‘ह्वेनसांग‘ ने अपनी वृतांत यात्रा ‘सी यू की‘ में लिखा कि मिहिर कुल ने बौद्ध विहारों का विध्वंस किया था।
  • नोट: राजस्थान में महाभारत कालीन पुरास्थल बैराठ (जयपुर) व नोह (भरतपुर) थे।

5. बागौर सभ्यता (भीलवाड़ा):

    • यह सभ्यता भीलवाड़ा जिले में कोठारी नदी के किनारे स्थित थी।
    • इसका उत्खनन 1967 में विरेन्द्रनाथ मिश्र ने किया।
  • यहाँ से मध्यपाषाण कालीन संस्कृति के अवशेष मिले हैं। यहाँ मकान पत्थरों से बने थे तथा लोग बस्ती बनाकर रहते थे।
    1. सुनारी (झुंझुनू): यहाँ से लौहयुगीन संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुये है। यहाँ अयस्क से लोहा बनाने की प्राचीनतम भट्टियाँ मिली है।
    1. जोधपुरा (जयपुर): यहाँ से मौर्यकाल व कुषाणकालीन सभ्यता के अवशेष मिले हैं।
    1. नगरी (चित्तौडगढ़): नगरी (मध्यमिका) से शिवि जनपद के सिक्के प्राप्त हुये हैं
    1. रैढ (टोंक): यहाँ से लौह सामग्री के विशाल भ.डार मिले हैं। इसे प्राचीन भारत का टाटा नगर भी कहा जाता है। यहाँ 2007 में एशिया का सबसे बड़ा सिक्कों का भण्डार मिला है। इनके अलावा मालव जनपद की मुद्रा व भारत के सबसे पुराने पंचमार्क सिक्के मिले हैं।
    1. मल्लाह (भरतपुर): यहाँ से एक हारफून नामक हथियार मिला है, जो कि बड़े जानवरों को मारने के काम आता था।
    1. सोंथी (बीकानेर): इसे कालीबंगा प्रथम के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ से पूर्व हड़प्पाकालीन अवशेष मिले हैं। इसका उत्खनन सन् 1953 में अमलानंद घोष ने किया।
    1. नलियासर (जयपुर): सांभर झील के समीप स्थित इस स्थल से चौहान युग से पूर्व की सभ्यता के अवशेष मिले हैं व प्रतिहार कालीन मंदिर के अवशेष प्राप्त हुये हैं।
  1. तिलवाड़ा (बाड़मेर): यह स्थल बाडमेर जिले में लूनी नदी के किनारे स्थित था। इस स्थल से 500 ई.पू. से 200 ई. तक के अवशेष मिले हैं।

काल सभ्यता स्थल

    • आरम्भिक पाषाण कालीन स्थल (1.5 लाख वर्ष पूर्व): बैराठ (जयपुर), सीकर।
    • मध्य पाषाण कालीन स्थल (50 हजार से 10 हजार वर्ष पूर्व): बिलाड़ा (जोधपुर), रैढ़ (टोंक)
    • उत्तर पाषाण कालीन स्थल (10 हजार से 5 हजार वर्ष पूर्व): तिलवाड़ा (बाड़मेर), बागौर (भीलवाड़ा)।
    • महाभारत कालीन सभ्यता स्थल: नेह (भरतपुर), बैराठ (जयपुर)।
    • ईसा से आरम्भिक शताब्दियों तक के अवशेष स्थल: नगरी (चित्तौडगढ़), भीनमाल (जालौर), बैराठ व सांभर (जयपुर)।
    • महाभारत व रामायण काल में राजस्थान में मरू, जांगल व मत्स्य प्रदेश विद्यमान थे।
    • पांडव अपने वन प्रवास के दौरान बैराठ (विराट नगर), पुष्कर व आबू में रूके थे। पांडवों ने अपने अज्ञातवास का एक वर्ष मत्स्य प्रदेश में बिताया था।
    • जनपद युग: आर्य धीरे-धीरे पंजाब से दक्षिण भारत की ओर आ गए व कबीलों में रहने लगे। इन कबीलों को जनपद कहा जाता था।     300 ई.पू. से 20 ई.पू. तक भारत में कुल 16 जनपद स्थापित हुये जिनमें से राजस्थान में प्रमुख जनपद निम्न थे:
    • मत्स्य: इस जनपद में जयपुर, अलवर, धौलपुर, भरतपुर व करौली के कुछ भाग सम्मिलित थे। इस जनपद की राजधानी बैराठ थी।
    • मालव: ये सिकन्दर के आक्रमण से पीड़ित होकर राजस्थान में टोंक व अजमेर में आकर बस गये। इन्होंने नगर (टोंक) को राजधानी बनाया। यह जनपद सर्वाधिक शक्तिशाली थी।
    • शिवि: ये सिकन्दर के आक्रमण से डरकर उदयपुर आ गये। इनकी राजधानी मध्यमिका (चित्तौड़) थी।
    • अर्जुनायन: ये भी सिकन्दर के आक्रमण से डरकर भरतपुर व अलवर में आकर बस गये।
    • यौद्धेय: ये गंगानगर-हनुमानगढ़ (उत्तरी राजस्थान) में रहते थे। ये कभी युद्ध नहीं हारे।
    • राजस्थान में मौर्य साम्राज्य के प्रमाण बैराठ में सम्राट अशोक के दो शिलालेखो (250 ई.पू.) से मिलते हैं। अशोक के त्रिरत्न अभिलेख से यहा स्पष्ट होता है कि राजस्थान के जनपदों पर चंद्रगुप्त मौर्य का राज था।
  • मौर्यकाल में राजस्थान, सिंध, गुजरात और कोंकण मिलकर अपर जनपद (पश्चिम जनपद) कहलाते थे।

गुप्तकाल:

    • समुद्रगुप्त ने 350 ई. में क्षत्रप वंश के राजा रूद्रदामन को हराकर दक्षिणी राजस्थान पर अधिकार कर लिया, परन्तु चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने अंतिम क्षत्रप राजा रूद्र को हराकर संपूर्ण राजस्थान पर अपना अधिकार कर लिया।
  • राजस्थान के विभिन्न भागों पर गुप्त राजाओं का आधिपत्य 275 ई. से 499 ई. तक रहा।

हूण वंश:

    • इस वंश के राजा तोरमण हूण ने 503 ई. में गुप्त राजाओं को हराकर राजस्थान पर अपना अधिपत्य कर लिया।
    • गुप्त सम्राट बालादित्य ने मालवा के शासक यशोवर्मा की सहायता से 552 ई. में तोरमाण हुण के पुत्र मिहिर कुल को हराकर वापिस राजस्थान पर अधिकार जमा लिया।
  • मिहिर कुल को भारत का अटिल्ला कहा जाता था।

वर्धन काल:

    • सातवीं शताब्दी के शुरू में हूणों के पतन के बाद गुर्जरों ने राजस्थान पर अधिकार कर लिया। इन्होंने भीनमाल (जालौर) को अपनी राजधानी बनाया।
    • प्रभाकर वर्धन ने गुर्जरों का राज समाप्त कर राजस्थान में वर्धन राज्य स्थापित किया।
    • प्रभाकर वर्धन के पुत्र हर्षवर्धन ने गुर्जरों से भीनमाल छीन लिया और मालवा को भी अपने साम्राज्य में मिला लिया। हर्षवर्धन ने राजस्थान के अधिकांश भाग पर 643 ई. तक राज किया।
  • चीनी यात्री ह्वेनसांग हर्षवर्धन के समय भीनमाल (जालौर) आया था।

राजस्थान का मध्यकालीन इतिहास (राजपूत काल)

    • वर्धन साम्राज्य के पतन के बाद भारत पुनः छोटे-छोटे राज्यों मे विभक्त हो गया। वर्धन वंश के पतन के बाद भारतीय इतिहास की प्रमुख घटना राजपूतों का उत्थान थी।
    • 7वीं से 12वीं शताब्दी का समय राजपूत काल कहलाता है। राजपूतों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में निम्न मत प्रचलित है।
    • चंदबरदाई के पृथ्वीराज रासों के अनुसार राजपूतों की उत्पत्ति गुरू वशिष्ठ के अग्निकु.ड से हुई है। इस अग्निकु.ड में प्रतिहार, परमार, चौहान और सोलंकी (चालुक्य) राजपूत उत्पन्न हुये है। ये अग्निकुंड आबू पर्वत में है।
    • गौरीशंकर हीराचन्द ओझा के अनुसार राजपूत वैदिक आर्यों की संतान हैं।
    • विदेशी इतिहास कारों ने राजपूतों को हूण व कुषाणों की संतान माना है, जबकि कर्नल जेम्स टॉड ने इन्हें सीथियन माना है।
  • आधुनिक सिद्धांत के अनुसार राजपूतांे की उत्पत्ति वैदिक काल के क्षत्रियों से हुई है। अतः राजपूत विशुद्ध भारतीय है। राजस्थान के राजपूत वंश निम्न है:

गुर्जर प्रतिहार

    • गुर्जर प्रतिहार वंश का शासन मुख्यतः 8वीं से 10वीं सदी तक रहा है। आरम्भ में इनकी शक्ति का प्रमुख केन्द्र मारवाड़ था। उस समय यह क्षेत्र गुर्जरात्रा (गुर्जर प्रदेश) कहलाता है। गुर्जर प्रदेश के स्वामी होने के कारण प्रतिहारों को गुर्जर प्रतिहार कहा जाने लगा। उस समय की मंदिर स्थापत्य शैली को गुर्जर प्रतिहार शैली कहा जाने लगा। गुर्जर प्रतिहारों ने 6वीं से 11वीं शताब्दी तक अरबों के आक्रमणों को रोके रखा।
    • गुर्जर प्रतिहारों का अधिपत्य राजस्थान के अलावा कन्नौज व बनारस तक भी था। कन्नौज 8वीं से 9वीं सदी तक व्यापार का प्रमुख केन्द्र था। इसलिये कन्नौज पर अधिकार हेतु गुर्जर-प्रतिहारों, बंगाल के पालवंश और दक्षिण के राष्ट्रकूटों के मध्य 100 वर्षों तक त्रिपक्षीय संघर्ष हुआ। अंत में गुर्जर प्रतिहार वंश के नागभट्ट द्वितीय ने 816 ई. में कन्नौज के शासक चक्रायुद्ध को हराकर कन्नौज को अपनी राजधानी बनाया व 100 वर्षीय युद्ध को समाप्त किया।
    • राजस्थान में गुर्जर प्रतिहारों की दो शाखाओं का अस्तित्व था। (1) मंडोर शाखा (2) भीनमाल (जालौर) शाखा।
    • मुहणोत नैणसी के अनुसार गुर्जर प्रतिहारों की 26 शाखाएँ थी। इनमें से मंडोर शाखा सबसे प्राचीन थी। राजस्थान में गुर्जर प्रतिहारों की प्रारंभिक राजधानी मंडोर (जोधपुर) थी। मंडोर के प्रतिहार क्षेत्रीय थे।
    • नागभट्ट प्रथम: प्रतिहार शासक नागभट्ट प्रथम ने 8वीं शताब्दी में भीनमाल पर अधिकार कर भीनमाल (जालौर) को अपनी राजधानी बनाया। बाद में उज्जैन उनकी शक्ति का प्रमुख केन्द्र रहा।
    • नागभट्ट द्वितीय (815-833 ई.): इसने 816 ई. में कन्नौज के शासक को हटाकर 100 वर्षीय युद्ध को समाप्त किया और कन्नौज को अपनी राजधानी बनाया। इस समय प्रतिहार उत्तरी भारत का सबसे शक्तिशाली वंश हो गया। नागभट्ट द्वितीय ने अरब आक्रमणों को कई समय तक रोके रखा।
    • मिहिर भोज (836-885 ई.): नागभट्ट द्वितीय का पौत्र मिहिर भोज प्रतिहार वंश का सर्वाधिक कुशल प्रशासक था। इसे आदिवराह की उपाधि मिली थी। इसके समय प्रतिहार सबसे शक्तिशाली थे। मिहिर भोज के दक्षिण विजयी अभियानों को राष्ट्र कूट शासक ध्रुव ने रोक दिया।
    • 1018 ई. में महमूद गजनवी ने कन्नौज पर आक्रमण कर दिया और प्रतिहारांे को मारवाड़ से निकाल दिया। इस वंश का अंतिम शासक यशपात था। 
    • किराडू (बाड़मेर) का सोमेश्वर मंदिर गुर्जर प्रतिहार शैली से बना है।
    • भोज प्रथम के शासन काल में ग्वालियर प्रशस्ति की प्रशंसा की गई।
    • ओसियां के महावीर स्वामी जैन मंदिर का निर्माण वत्सराज प्रतिहार के शासन काल में हुआ।
    • महामारू शैली का प्रचलन गुर्जर प्रतिहारों के काल में ही हुआ।
  • प्रारंभिक प्रतिहार शासकों की जानकारी उधोतन सूरी द्वारा रचित ‘कुवलयमाला‘ से मिलती है।
राजस्थान में प्रचलित प्रसिद्ध सिक्के
सिक्के का नाम स्थान/शासक
झाड़शाही, मोहम्मद शाही जयपुर
विजयशाही, भीमशाही, गधिया व फदिया जोधपुर
अखैशाही जैसलमेर
चांदोड़ी, स्वरूपशाही,भीलाड़ी मेवाड़
उदयशाही डूंगरपुर
मदनशाही झालावाड़
आलमशाही प्रतापगढ़
गजशाही बीकानेर
तमंचाशाही धौलपुर
गुमानशाही कोटा
कलदार ब्रिटिशकाल में
अखयशाही अलवर
राजस्थान के प्रमुख राजवंश तथा उनके राज्य
राजवंश राज्य
चौहान वंश सांभर, अजमेर, रणथम्भौर, नाडोल, जालौर, सिरोही, हाड़ौती
गुहिल वंश मेवाड़ (उदयपुर, चित्तौड, प्रतापगढ़, डूंगरपुर, बाँसवाड़ा, शाहपुरा, राजसमंद)
राठौड़ वंश जोधपुर, बीकानेर, किशनगढ़
कच्छवाहा ढूंढाड़ (जयपुर, आमेर), अलवर
यादव करौली, जैसलमेर
परमार आबू, मालवा, जालौर
भाटी जैसलमेर
झाला झालावाड़
जाट वंश भरतपुर, धौलपुर
मुस्लिम नवाब टोंक
गुर्जर-प्रतिहार गुर्जरात्रा, मारवाड़, भीनमाल
राजस्थान के विभिन्न राज्यों की स्थापना
राज्य वंश संस्थापक वर्ष
शाकम्भरी (अजमेर) चौहान वासुदेव 551 ई.
रणथम्भौर चौहान गोविन्दराज 1194 ई.
जालौर चौहान कीर्तिपाल 1181 ई.
नाडोल चौहान लक्ष्मण 983 ई.
बूँदी हाड़ा चौहान देवीसिंह 1240 ई.
कोटा हाड़ा चौहान माधोसिंह 1625 ई.
मेवाड़ गुहिल गुहिल 566 ई.
मेवाड़ गुहिल बप्पा रावल 728 ई.
बागड़ गुहिल समर सिंह 1177 ई.
डूंगरपुर गुहिल पृथ्वीराज 1527 ई.
बाँसवाड़ा गुहिल जगमाल सिंह 1527 ई.
प्रतापगढ़ गुहिल प्रताप सिंह 1699 ई.
शाहपुरा गुहिल सुजान सिंह 1631 ई.
मारवाड़ राठौड़ राव सीहा 1256 ई.
बीकानेर राठौड़ राव बीका 1465 ई.
किशनगढ़ राठौड़ किशन सिंह 1609 ई.
आमेर कच्छवाहा धोलाराय 967 ई
ढूंढाड़ (जयपुर) कच्छवाहा दुल्हेराय 1137 ई.
अलवर कच्छवाहा प्रताप सिंह 1771 ई.
जैसलमेर भाटी राव जैसल 1155 ई.
करौली यादव विजय पाल 1348 ई.
भरतपुर जाट चूड़ामण 1720 ई.
टोंक पिण्डारी अमीर खाँ 1817 ई.
महत्वपूर्ण स्थानों के प्राचीन नाम
वर्तमान नाम प्राचीन नाम वर्तमान नाम प्राचीन नाम
अजमेर अजयमेरू जोधपुर मरूभूमि
धौलपुर कोठी झालरापाटन ब्रजनगर
करौली गोपालपाल (कल्याणपुर) जैसलमेर मांड
श्रीगंगानगर रामनगर झालावाड़ खींचीवाड़ा
चित्तौडगढ़ चित्रकूट महावीर जी चांदन
बीकानेर जांगल बूँदी हाड़ौती
मण्डोर माण्डवपुर रामदेवरा रूणैचा
हनुमानगढ़ भटनेर नागौर अहिच्छत्रपुर
बैराठ (जयपुर) विराटनगर चित्तौडगढ़ खिज्राबाद
सांचौर (जालौर) सत्यपुरी भीनमाल  (जालौर) भिल्लमाल
जालौर जाबालीपुर (जलालाबाद) अनूपगढ़ चुघेर
सांभर (जयपुर) सपादलक्ष तारागढ़ गढबीठली
बयाना (भरतपुर) श्रीपंथ जयपुर ढूंढाड़
अलवर आलोर (साल्वपुर) जयसमंद ढेबर
प्रतापगढ़ कांठल ओसियां (जोधपुर) उकेर 

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10 Most Important Question Daily

10 Most Important Question Daily

Geetanjali Academy- By Jagdish Takhar

 

हम प्रतिदिन 10 प्रश्नों का अभ्यास लगातार आप को प्रदान करेंगें ताकि परीक्षा तक हजारों अतिमहत्वपूर्ण सूचनाओं, तथ्यों ,योजनाओं का संकलन आप तक पहुँच सकें एवं आपकी परीक्षा की तैयारी को आप खुद जाँच सकें।

 

1. निम्नलिखित में से किस शिलालेख में चित्तौड़ का नाम खिज्राबाद अंकित है ? 

(A) धाई बी.पीर की दरगाह का लेख। 

(B) शेख मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह का लेख। 

(C) प्रतापगढ़ का ताम्रपत्र शिलालेख। 

(D) कीर्तिस्तम्भ प्रशस्ति। 

 

2. ब्राह्मणों पर लगने वाले टंकी नामक कर का उल्लेख मिलता है ? 

(A) आहड़ ताम्रपत्र 

(B) प्रतापगढ़ ताम्रपत्र 

(C) आमेर का लेख 

(D) रणकपुर प्रशस्ति 

 

3. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिये हुये कूट का प्रयोग करते हुये सही उत्तर का चयन कीजिए – 

सूची-I 

(प्रमुख राजवंष)

सूची-II

(सम्बन्धित सिक्के)

A. जैसलमेर 1. स्वरूपशाही
B. उदयपुर 2. विजयशाही
C. जोधपुर  3. झाडशाही
D. जयपुर  4. अखैशाही

 

कूट: 

(A) A -3, B -4, C-1, D-2 

(B) A -4, B – 1, C-2, D-3 

(C) A -2, B – 3, C-4, D-1 

(D) A -1, B – 3, C-4, D-2 

 

4.  जिन शिलालेखों में मात्र किसी शासक की उपलब्धियों की यषोगाथा होती है, उसे कहते है- 

(A) पुरालेख 

(B) शिलालेख 

(C) प्रशस्ति 

(D) स्मारक

 

5. कठमाना बही में शामिल किया जाता था – 

(A) राजा के शासकीय आदेशों की नकल। 

(B) राजा को प्राप्त होने वाले महत्वपूर्ण पत्रों की नकल। 

(C) राजकीय भवनों, महलों पर होने वाले खर्च का लेखा-जोखा। 

(D) भूमि के रिकॉर्डों सम्बन्धित बही। 

 

6. राजस्थान के इतिहास एवं संस्कृति में शामिल खरीता नामक शब्दावली का अर्थ है – 

(A) वह पत्र जो एक शासक द्वारा दूसरे शासक को भेजे जाते थे। 

(B) वह पत्र जो एक शासक द्वारा अपने अधीनस्थ कर्मचारियांे को भेजे जाते है। 

(C) मुगल दरबार द्वारा प्रकाशित दैनिक समाचारों का संग्रह। 

(D) शहजादों व बेगमों द्वारा लिखे गये पत्र। 

 

7. मुगल सम्राट द्वारा शाही वंश के लोगों या विदेशी शासकों के नाम भेजे जाने वाले पत्रों का कहा जाता था – 

(A) परवाना 

(B) निशान 

(C) अखबारात 

(D) रूक्के 

 

8. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिये हुये कूट का प्रयोग करते हुये सही उत्तर का चयन कीजिए – 

सूची-I (प्राचीनतम प्रदेश) सूची-II (राजधानी)
A. मरू  1. मथुरा
B. मांड  2. मध्यमिका
C. सूरसेन  3. जैसलमेर
D. शिवी  4. मंडौर

 

कूट:

(A) A -3, B-4, C-1, D-2 

(B) A -4, B-3, C-1, D-2

(C) A -2, B-3, C-4, D-1 

(D) A -1, B-3, C-4, D-2 

 

9. ऐसी कौनसी जगह है, जो कि मत्स्य, सूरसेन व कुरू प्रदेश में बँटा था – 

(A) भरतपुर 

(B) धौलपुर

(C) अलवर 

(D) करौली

 

10. चंद्रवर्ती नामक प्राचीन प्रदेश में शामिल वर्तमान अंचल है – 

(A) डूंगरपुर व बांसवाडा का क्षेत्र। 

(B) गंगानगर के आसपास के क्षेत्र। 

(C) झालावाड़ का क्षेत्र। 

(D) सिरोही व आबू के आसपास का क्षेत्र 

Answer Sheet 
Question 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10
Answer A B B C C A D B C D

 

10 Most Important Question Daily

हम प्रतिदिन 10 प्रश्नों का अभ्यास लगातार आप को प्रदान करेंगें ताकि परीक्षा तक हजारों अतिमहत्वपूर्ण सूचनाओं, तथ्यों ,योजनाओं का संकलन आप तक पहुँच सकें एवं आपकी परीक्षा की तैयारी को आप खुद जाँच सकें।

 

1. योजना आयोग के स्थान पर नीति आयोग का गठन हुआ-

(A) 1 जनवरी,2015 को

(B) 5 जनवरी, 2015 को

(C) 28 जनवरी,2015 को

(D) 31 जनवरी, 2015 को

 

2. भारत में गरीबी के अनुमानों का आधार है?

(A) प्रति व्यक्ति आय

(B) प्रति व्यक्ति पोषण

(C) परिवार में से कोई नहीं

(D) उपयुक्त में से कोई नहीं

 

3.  कार्पाट का सबंध है-

(A) कम्प्यूटर हाईवेयर से

(B) निर्यात वृद्धि हेतु परामर्शी सेवा से

(C) बडे़ उद्योगों में प्रदूषण के नियंत्रण से

(D) ग्रामीण कल्याण कार्यक्रमों की सहायता व मूल्यांकन

 

4. एकीकृत बाल विकास सेवा योजना किसके द्वारा लागू की गई

(A) शिक्षा मंत्रालय

(B) एच.आर.डी. मंत्रालय

(C) वित्त मंत्रालय

(D) महिला एवं बाल-कल्याण मत्रांलय

 

5. निम्नलिखित में से कौन-सा एक असामनता घटाने का उपाय नहीं है?

(A) न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम

(B) अर्थव्यवस्था का उदारीकरण

(C) करारोपण

(D) भूमि-सुधार

 

6. कौन सा सुमेलित-

सूची I सूची II
(A) सर्व शिक्षा अभियान 1. 1987
(B) साक्षर भारत मिशन 2. 1988
(C) ऑपरेशन ब्लैक बौर्ड 3. 2001
(D) राष्ट्रीय साक्षरता मिशन 4. 2009

 

 कूट

A B C D
(a) 3 4 1 2
(b) 4 3 2 1
(c) 1 2 3 4
(d) 4 3 2 1

 

7. प्रधानमंत्री मुद्रा योजना का लक्ष्य क्या है –

(A) लघु उद्यमियों को औपचारिक वित्तीय प्रणाली में लाना।

(B) निर्धन कृषकों को नगदी फ़सलों की कृषि के लिये ऋण उपलब्ध करना।

(C) वृद्ध व निःसहाय लोगों को पेंशन देना।

(D) कौशल विकास एवं रोज़गार सृजन में लगे स्वयंसेवी संगठनों का निधीकरण (फंडिंग) करना।

 

8. अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) का प्रमुख कार्य है –

(A) बैंक से अंतर्राष्ट्रीय जमा राशियों की व्यवस्था करना।

(B) सदस्य देशों की भुगतान संतुलन सम्बन्धी समस्याओं के समाधान में सहायता करना।

(C) विश्व बैंक की निजी क्षेत्रक उधारदाता शाखा के रूप में काम करना।

(D) विकासशील देशों के लिये निवेश ऋणों की वित्त व्यवस्था करना।

 

9. BRICS देशों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनो पर विचार कीजिए –

  1. वर्तमान मे, चीन का सकल घरेलू उत्पाद, अन्य तीनों देशों के सकल घरेलू उत्पाद के योग से  अधिक है।
  2. चीन की जनसंख्या किन्ही अन्य दो देशों  की जनसंख्या के योग से अधिक है।

उपयुक्त में से कौनसा/से कथन सही है/हैं –

(A) केवल 1 

(B) केवल 2

(C) 1 और 2 दोनों 

(D) न तो 1 और न ही 2

 

10. व्यापार करने की सुविधा का सूचकांक में भारत की रैंकिंग समाचार-पत्रों में कभी-कभी दिखती है।

निम्नलिखित में से किसने इस रैंकिंग की घोषणा की है

(A) आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD)

(B) विश्व आर्थिक मंच

(C) विश्व बैंक

(D) विश्व व्यापार संगठन (WTO)

 

Answer Sheet 
Question 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10
Answer A C D D B A A B A C
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